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ये न सुधरने वाले... कानून को दिखा रहे काला शीशा

अनुज शर्मा | Dec 29, 2012, 07:59AM IST
ये न सुधरने वाले... कानून को दिखा रहे काला शीशा
अमृतसर। दिल्ली गैंग रेप के बाद सुप्रीम कोर्ट का गाड़ियों से काले शीशे हटाने का निर्देश गुरु नगरी में बेअसर हो रहा है। शहर में पुलिस और प्रशासन के सामने ही आम व खास लोग काले शीशे को चढ़ाकर धड़ल्ले से घूम रहे हैं। दिल्ली की घटना ने भले ही पूरे देश समेत शहर को झकझोर दिया हो, लेकिन गाड़ियों से शीशे हटाने का काम पुलिस की प्राथमिकता में नहीं दिखाई दे रहा है। पुलिसिया अभियान का आलम यह है कि बसों व कारों से काले शीशे अभी भी पूरी तरह से नहीं हटे हैं।
 
शहर में काली फिल्में लगे वाहनों पर अभी तक रोक नहीं लग पाई है। इनमें से कई वाहन तो ऐसे हैं, जिन्होंने नीली और लाल बत्तियां भी लगा रखी हैं।  ऐसे में आम आदमी तो दूर पुलिस प्रशासन भी यह पता नहीं लगा सकता कि वाहन में कोई अपराधी बैठा है या कोई वीआईपी। दिल्ली में हुई गैंगरेप की घटना ने वाहनों से ब्लैक फिल्म को हटाने की जरूरत को और भी अधिक बढ़ा दिया है, लेकिन पुलिस प्रशासन इस ओर गंभीर नजर नहीं आ रहा।
 
अंदर नहीं दिखता कुछ भी
 
बीते समय में अधिकतर घटनाएं काले शीशे लगे हुए वाहनों में ही हुई हैं। पहले नियम के अनुसार वाहनों में 70 प्रतिशत विजिबिलिटी वाली फिल्में लगाने की छूट थी, लेकिन फिर भी लोग जेड ब्लैक फिल्म ही शीशों पर लगाना पसंद करते थे। ऐसी गाड़ियों में जैसे ही शाम होने लगती है, गाड़ी के अंदर दिखना बंद हो जाता है। ऐसे वाहनों का ही प्रयोग आपराधिक मामलों में अधिक देखा गया है। ऐसे में पुलिस और जिला प्रशासन की चुप्पी समझ नहीं आती। ऐसे वाहनों की ओर तुरंत ध्यान दिया जाना आवश्यक है।
 
जानकारी के बावजूद चुप्पी
 
वाहनों पर फिल्म चढ़ाने का काम कार असेसरीज वाले दुकानदार करते हैं। क्वींज रोड और कोर्ट रोड पर दुकानदारों को कारों के शीशों पर फिल्म लगाते आम देखा जा सकता है। कई बार तो दुकानदार भी वाहन चालकों को सही जानकारी नहीं देते और पैसे कमाने की खातिर वाहनों पर काली फिल्म लगा देते हैं। वह यह नहीं सोचते कि ऐसे वाहन आपराधिक गतिविधियों में ज्यादा प्रयोग होते हैं। 
 
बसों पर कोई ध्यान नहीं
 
पुलिस ने मार्च में सुप्रीम कोर्ट के आर्डर के बाद वाहनों से तो काली फिल्म उतारना शुरू कर दिया था, लेकिन न तो तब और न ही दिल्ली में गैंगरेप के बाद पुलिस प्रशासन का ध्यान बसों की ओर गया। निजी बसों खासकर मिनी बसों पर काली फिल्में लगी आम देखी जा सकती हैं। अभी तक पुलिस विभाग ने निजी बसों और मिनी  बसों के खिलाफ काली फिल्में लगाने पर कार्रवाई नहीं की। ऐसे में पुलिस प्रशासन का काली फिल्मों वाले वाहनों के खिलाफ अभियान कितना कारगर हो पाएगा है, यह स्पष्ट हो जाता है। वैसे भी निजी बसों को ऐसी छूट मामले को लेकर कई तरह के सवाल खड़े करती है। 
 
खास बात यह है कि महिलाओं से छेड़छाड़ के ज्यादा मामले ऐसी ही बसों में सामने आते हैं। भास्कर सर्वे में भी ज्यादातर महिलाओं ने माना था कि उनके साथ ऐसी घटनाएं ज्यादातर बसों आदि में ही होती हैं। ऐसे में पुलिस की ढिलमुल कार्रवाई समझ से परे की बात बन जाती है। 
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