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यादें : डेढ़ आने का पोस्टकार्ड भेज मांगते थे वोट

 
Source: भवेश चंद   |   Last Updated 10:02(29/01/12)
 
 
 
 

जालंधर. बतौर केंद्रीय मंत्री सबसे लंबे समय (1952-76) तक देश की सेवा करने वाला नेता देने का श्रेय जालंधर को जाता है। राजनीति और सेवा की वह महान हस्ती थे सरदार स्वर्ण सिंह। गांव शंकर के मूल निवासी और न्यू जवाहर नगर जालंधर में रहने वाले सरदार स्वर्ण सिंह चुनाव प्रचार कैसे करते थे? हैरत होगी मगर सच यह है कि महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी होने के कारण उनके पास चुनाव प्रचार का वक्त नहीं होता था।

 

डेढ़ आने का पोस्टकार्ड खरीदकर विभिन्न गांवों के प्रमुख लोगों, सीनियर कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भेज देते। वही प्रमुख लोग, वरिष्ठ कार्यकर्ता लोगों को पोस्टकार्ड पढ़कर सुना देते, जिसमें वोट देने की अपील होती थी। सरदार स्वर्ण सिंह का इतना संदेश काफी था.. लोग आंख मूंदकर उन्हें वोट दे देते थे।

 

पाकिस्तान के चौथे राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने बांग्लादेश का गठन होने से ठीक पहले कहा था- पता नहीं क्या है, स्वर्ण सिंह को गुस्सा ही नहीं आता। सचमुच उन्हें गुस्सा नहीं आता था। सब जानते हैं कि भारत-पाक युद्ध और फिर पाक विभाजन के बाद भारत का सिर गौरव से ऊंच हुआ था। उस वक्त विदेश मंत्री थे सरदार स्वर्ण सिंह। यादों के झरोखे में जाकर किस्सों की यह किताब खोली बलबीर कौर ने। सरदार स्वर्ण सिंह के भतीजे और उनकी राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी सरदार बलबीर सिंह की पत्नी बलबीर कौर लायलपुर खालसा कालेज की चेयरमैन हैं।

 

महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी होने के कारण वह अत्यधिक व्यस्त रहा करते थे। चुनाव के दिनों में आते और नॉमिनेशन कर चले जाते। यहां उनके सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक टीम थी जो बाकी का काम देखती। वह तो पोस्टकार्ड लिखकर चले जाते थे। पोस्ट करने या हाथोंहाथ पहुंचाने की जिम्मेदारी कार्यकर्ता संभालते थे। वोटरों को सिर्फ सरदार स्वर्ण सिंह के संदेश का इंतजार होता था।

 

जालंधर में उनका चुनाव से संबंधित काम देखने वालों में करम सिंह कीर्ति, कृपाल सिंह ढिल्लों, प्रीतम सिंह, डा. लेखराज, सरदार उमराव सिंह, दर्शन सिंह केपी, शाह गुरदास मल, बख्तावर सिंह, जत्थेदार स्वर्ण सिंह, जयइंदरा सिंह प्रमुख थे। उनके साथ रह चुके चन्नन सिंह चिट्टी अभी जीवित हैं और न्यू जवाहर नगर में ही रहते हैं। चिट्टी बताते हैं कि आजकल टिकट हासिल करने के लिए तमाम पापड़ बेलने पड़ते हैं। सरदार स्वर्ण सिंह भी चिंतित होते थे, मगर इसलिए कि नॉमिनेशन का वक्त कैसे निकालें? इसलिए नहीं कि प्रचार कैसे होगा, जीत कैसे मिलेगी।

 

सरदारजी की सादगी की लोग चर्चा करते थे। खुद फोन रिसीव करते थे। गाड़ी भी खुद चलाते थे। जालंधर आते तो फल-सब्जी खरीदने बाजार निकल पड़ते। अब तो नेता माने तड़क-भड़क। बलबीर कौर कहती हैं कि शायद बड़े सरदार जी (सरदार स्वर्ण सिंह) को राजनीति का भविष्य पता था। इसलिए बेटियों और भतीजे की शादी गैर राजनीतिक परिवार में की।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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