श्रीगंगानगर/अजमेर.पति के लौटने की आस में आंखें पथरा गई हैं। दरवाजे पर आहट होते ही आंखें इधर-उधर देखने लगती हैं कि शायद वो लौट आए हों।चेहरे पर झुर्रियां आ गई हैं। बरसों बीत गए आईने में खुद को निहारे हुए। अब मानो सजने-संवरने की ख्वाहिश ही मर गई है। बच्चे बड़े हो गए हैं, इसलिए उन्हें झूठी तसल्ली भी नहीं दे सकतीं। ये कहानी सेनू आरा बेगम जैसे कई महिलाओं की है, जिन्होंने पति के इंतजार में वर्षो गुजार दिए। रो-रोकर आंखें थक गईं। कुछ मायके चली गईं तो कुछ अब भी उम्मीद में हैं कि पति लौटकर आएंगे। इसी आस में वक्त गुजर रहा है।