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जिंदगी में तो सभी प्यार करते हैं, मैं तो मरकर भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा..
सर्वेश भट्ट
| Jun 14, 2012, 04:11AM IST

जयपुर के लोग आखिरी बार उनकी गजलों से 22 सितंबर, 2000 को रूबरू हुए। मौका था राजस्थान सरकार की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय अप्रवासी राजस्थानी सम्मेलन के दौरान अल्बर्ट हॉल पर आयोजित कार्यक्रम 'गूंज'का। इसमें उनके अलावा जगजीत सिंह, पं.जसराज और पाकिस्तानी गायिका रेशमा के भी कार्यक्रम हुए।
इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में रात्रि 1:30 बजे मेहदी हसन को उनके परिजन गोद में उठाकर मंच तक लाए, क्योंकि उस समय उनके पैरों में तकलीफ थी और वो मंच पर चढ़ने और चलने में असमर्थ थे। इस कार्यक्रम की शुरुआत उन्होंने फैज अहमद फैज की गजल गुलों में रंग भरे बादेनो बहार चले, चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले..से की।
केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस
विभाजन के बाद वे पाकिस्तान चले गए, लेकिन राजस्थान की मिट्टी से उनका मोह कभी नहीं छूट पाया। वे अक्सर भारत आने को बेकरार रहते थे। राजस्थान की संस्कृति को खूबसूरती से बयां करने वाले गीत केसरिया बालम आवो नी पधारो म्हारे देस.. को भी उन्होंने अपनी आवाज दी। वो इसे अपनी माटी का गीत कहते थे।
सिमटे तो इस अदा से कि दिल में समा गए
गजल गायक मोहम्मद वकील ने उनके निधन पर कहा कि मेहदी हसन की गजलें और उनकी पुरकशिश आवाज बीसवीं और इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी सांगीतिक उपलब्धि के रूप में कायम रहेगी। उन्होंने उनकी शान में एक शेर पेश करते हुए कहा - फैले तो कायनात की हर शह पे छा गए, सिमटे तो इस अदा से कि दिल में समा गए..
मर के भी तुम्हें चाहूंगा
पं. विश्वमोहन भट्ट उनके निधन पर दुख जताते हुए उन्हें उन्हीं की लोकप्रिय गजल - जिंदगी में तो सभी प्यार करते हैं, मैं तो मरकर भी मेरी जान तुम्हें चाहूंगा..से स्वरांजलि दी।
गजल के सुर अनंत में विलीन
वरिष्ठ गजल गायक उस्ताद नाजिम हुसैन ने कहा कि उनका चला जाना मानो गजल के सुरों को भी अपने साथ ले गया। मुझे आज भी जयपुर में सजी उनकी आखिरी महफिल याद है जब उन्होंने अपनी आवाज का जादू चलाया था।






