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कर्ज से बने अफसर अभी भी हैं कर्जदार

 
Source: Bhaskar News   |   Last Updated 07:44(10/02/12)
 
 
 
 
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जयपुर. राज्य के 12 हजार लोग शिक्षा के नाम पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से दी गई वित्तीय सहायता हजम कर गए हैं। लंबा अरसा गुजरने के कारण कई देश-विदेश में बस गए, तो कई ने अपना घर बदल डाला है।


यह राशि करीब 120 लाख रु. है। केंद्र के दबाव में अब राज्य का उच्च शिक्षा विभाग पुलिस के मार्फत नोटिस भेजकर यह राशि वसूलने की कोशिश में लगा है। फिलहाल पहले चरण में 3 हजार लोगों को नोटिस भेजे हैं।


देशभर में राष्ट्रीय ऋण छात्रवृत्ति योजना 1963-64 में शुरू हुई थी, जो 1991 तक चली। इस दौरान प्रदेश में भी बड़ी संख्या में लोगों ने स्कूली और कॉलेज शिक्षा के लिए जरूरत के हिसाब से ऋण लिया। ऋण शर्त के मुताबिक लेने वाले को किश्त योजना में यह राशि दुबारा चुकानी होती है।


योजना बंद होने के बाद एक अरसा गुजर जाने के बावजूद प्रदेश के करीब 12 हजार लोगों ने ऋण नहीं चुकाया। इस दौरान केंद्र की ओर से शेष राशि लौटाने के लिए लगातार रिमाइंडर आते रहे और इधर उच्च शिक्षा विभाग ऋण लेने वालों से लगातार संपर्क करता रहा, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आखिरकार विभाग ने पुलिस की मदद से बकाया राशि वालों को नोटिस देना शुरू कर दिया है। वसूली ब्याज सहित की जाएगी।


आईपीएस ने धमकाया, हिम्मत कैसे हुई नोटिस भेजने की


विभाग के सहायक लेखाधिकारी एसएल बैरवा ने बताया कि पिछले दिनों नोटिस से तिलमिलाए दक्षिण के एक आईपीएस अफसर ने तो संकुल में आकर हमें धमका तक दिया। आईपीएस का तर्क था कि महज 2200 रुपए के लिए विभाग ने उन्हें नोटिस भेजने की हिम्मत कैसे की? इस पर विभाग ने शर्तो का हवाला देते हुए कानूनी कार्यवाही की बात की। काफी देर बाद मामला शांत हुआ और आईपीएस ने कई साल पहले ली गई राशि को जमा करवा दिया।


अफसर, उद्योगपति बन गए पर नहीं लौटाई राशि


शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार लंबा समय गुजरने के कारण पूर्व में ऋण लेने वाले कई अफसर, उद्योगपति तक बन गए हैं, लेकिन उन्होंने राशि लौटाना मुनासिब नहीं समझा। विभाग के पास अभी यह सूची नहीं है कि ऋण लेने वाले किस पद पर पहुंच गए हैं।


सरकार करेगी फैसला


करीब 12 हजार लोगों ने बकाया नहीं लौटाया। केंद्र का पैसा है, शर्तो के मुताबिक लौटाना होगा। फिलहाल विभाग पीडीआर एक्ट के तहत पुलिस की मदद ले रहा है। फिर भी वसूली नहीं हुई तो राज्य सरकार को फैसला करना होगा।


-एसएल बैरवा, सहायक लेखाधिकारी, उच्च शिक्षा विभाग
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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