जब आप सिनेमा देखते हैं, तो आपको उस दौर के समाज का चेहरा साफ-साफ दिखाई देता है। हिंदुस्तान एक ऐसा देश है, जहां फिल्म स्टार्स की पूजा की जाती है, मंदिर बनाए जाते हैं। अगर आप साठ के दशक के बॉलीवुड के खलनायकों पर नजर डालें, तो पाएंगे कि उस जमाने का खलनायक जमींदार या ठाकुर हुआ करता था।
अस्सी और नब्बे के दशक में खलनायक ने राजनेता का रूप ले लिया। इसके बाद पाकिस्तानी खलनायकों का दौर आया और आज देखिए खलनायक बचे ही नहीं हैं, क्योंकि वे जो करते थे, वह आज के हीरो का पैशन बन गया है। यही बदलाव फिल्मों के हीरो में भी देखा जा सकता है। सत्तर के दशक का हीरो एंग्री यंगमैन था, जिसका विश्वास देश के कानून और व्यवस्था से उठ गया था।
आज फिल्मों में कहानियों की बहुत कमी है, क्योंकि हर प्रोड्यूसर ऐसी नई कहानी चाहता है, जो पुरानी कहानी से मिलती-जुलती हो। कहानियां जहां कम हो हो रही हैं, वहीं भाषा भी सिकुड़ रही है। शायद मेरी पीढ़ी ही इसके लिए जिम्मेदार है। साठ और सत्तर के दशक के बीच जब मिडिल क्लास सरपट दौड़ने की तैयारी कर रहा था, तो सामान की एक पोटली पीछे प्लेटफॉर्म पर ही छोड़ आया। उसी पोटली में भाषा, कविता, साहित्य, किस्से-कहानियां और तहजीब भी रह गई।
आज हम अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम के अलावा पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकते। हिंदी और रीजनल लैंग्वेज तो किसी गली में खो सी गई है। आज जब इंग्लिश मीडियम से पढ़ा यह बच्चा एडवरटाइजिंग या फिल्मों के माध्यम से आमजन तक बात पहुंचाने की कोशिश करता है, तो बंद कमरे में सालों से घुटी भाषा की याद आती है।