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अब परिवार के लायक नहीं बचा सिनेमा, सहमी हुई है फैमिली ऑडियंस
Bhaskar News
| Jul 30, 2012, 04:04AM IST

ज्यादातर लोगों का कहना है कि सिनेमा अब परिवार के लिए तो बचा ही नहीं है। ऐसे में सिनेमाघरों का माहौल भी खराब होने लगे तो बेहतर है हम फिल्म देखे ही नहीं। रविवार को भी सिटी भास्कर ने शहर के अलग-अलग सिनेमाघरों से निकले परिवारों से बातचीत की तो लोगों ने कहा कि पिछले कुछ समय से मल्टीप्लेक्स के महौल में बदलाव आना शुरू हुआ है।
फिल्म देखने आए बिजनेसमैन विकास जैन ने बताया, मल्टीप्लेक्स में हम यह सोचकर आते थे कि यहां कम से कम मैच्योर ऑडियंस मिलेगी लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगती है। मोहन गोयल ने कहा फिल्म चुनना तो हमारे हाथ में है, लेकिन अंदर बैठी ऑडियंस पर हमारा बस नहीं है। ऐसे में मल्टीप्लेक्स को ही पहल कर अपनी छवि में सुधार करना चाहिए। हाउसवाइफ पिंकी और रानी ने कहा, सिनेमा प्रशासन को खुद मौजूद रहकर यह देखना चाहिए कि वाकई मल्टीप्लेक्स में जाने से भी क्यों परिवार कतरा रहे हैं।
ऐसे में बाहर होंेगे सिनेमा हॉल से
'मल्टीप्लैक्स इसलिए ही पब्लिक को ज्यादा आकर्षित करते हैं कि वहां उनको सिंगल स्क्रीन से बेहतर वातावरण मिले। असामाजिक तत्वों की उपस्थिति की कोई भी शिकायत आएगी तो जरूर कार्रवाई होगी। दर्शक का कोई कमेंट अगर अश्लीलता की सीमा में आएगा तो जरुर उसे सिनेमा से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा।'
-राजबंसल, डायरेक्टर, ईपी
'मुझे नहीं लगता कि हमारे यहां किसी तरह का माहौल खराब हो रहा है। माहौल खराब करने वाली ऐसी ऑडियंस को बाहर निकालने पर स्थिति ज्यादा खराब हो सकती है। इसलिए हम परिस्थिति को ध्यान में रखकर कदम उठाएंगे।'
-हरीश कुन्ते, एरिया मैनेजर, बिग सिनेमा
'हम ऐसे लोगों को एंट्री करने से पहले ही रोक देते हैं, जिन्होंने ड्रिंक की होती है। अगर दर्शकों को सिनेमाघर के माहौल या अव्यवस्था से परेशानी हो, तो बेझिझक प्रशासन से संपर्क करे, हम मदद को तैयार हैं।'
-अमिताभ जैन, मैनेजर, आयनॉक्स
मेरी सीट बदलवाई
'मां के साथ एक बॉलीवुड फिल्म देखने गई और लोगों की अभद्र भाषा सुनने के बाद मैंने वहां के प्रशासन से इस बारे में बात की, तो उन्होंने उन लोगों से कुछ कहने के बजाय मेरी सीट बदलना बेहतर समझा। इसके बाद ऐसा ही एक-दो बार अलग-अलग मल्टीप्लेक्स में हुआ तो मैंने फिल्म देखने से ही तौबा कर ली।'
-शालिनी मिश्रा, हिम्मत नगर
दूसरे सिनेमाघर जाओ
'बनीपार्क स्थित एक मल्टीलेक्स में हालिया रिलीज फिल्म बोल बच्चन देखने मैं, बहन और उसकी फ्रैंड गए थे। फिल्म के शुरू होते ही कुछ लोग बेहूदा टिप्पणी, बेवजह गाली-गलौच और हमसे बदतमीजी करने लगे। जब उनसे ऐसा करने के लिए मना किया तो उल्टा मुझसे ही कहा कि किसी दूसरे सिनेमाघर जाओ। इसकी शिकायत मैनेजमेंट से की तो मुझे फिल्म के बीच व्यवधान न डालने की सलाह दे डाली।'
-अभय चौधरी, मुरलीपुरा
असहज महसूस करता रहा
'स्पाइडरमैन फिल्म देखने गए थे। उस फैमिली फिल्म में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिस पर कोई अभद्र टिप्पणी की जा सके। उसके बावजूद कुछ लोग माहौल बिगाड़ते रहे। यह देख परिवार के साथ मैं असहज महसूस करता रहा।'
-मंजर हैदर, आमेर रोड
'सिनेमा प्रशासन को खुद वहां मौजूद रहना चाहिए। कुछ सजा का भी प्रावधान होना चाहिए। सिनेमाघरों में युवाओं का हुड़दंग होता देख मैंने तो सिनेमा देखना ही बंद कर दिया।'
-दीनदयाल शर्मा, तारों की कूट
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