त्वरित टिप्पणी: उतरा वर्ल्ड क्लास सिटी का मुखौटा

जयपुर में मंगलवार आधी रात अचानक हुई अभूतपूर्व बारिश ने हमारी शहरी सरकार का आखिरी नकाब भी नोच डाला। प्रकृति से पस्त-पराजित प्रशासन शुतुरमुर्ग की तरह जमीन में गर्दन धंसाए सोया रहा और बारिश की मार से बेचैन आधा शहर सुबह तक जान-ओ-माल बचाने की जद्दोजहद में लगा रहा।
चार घंटे की इस बारिश ने बता दिया कि हमारे अफसर सिर्फ कागजों में ही राहत कार्यो के इंचार्ज हैं। उनके आलीशान दफ्तरों में ही आपदा से निपटने के नक्शे, मॉडल, भड़कीले प्रजेंटेशन और ब्लूप्रिंट लटके हुए हैं। जबकि हकीकत ये है कि जब मुसीबत आती है तो आम शहरी अकेला होता है। इस बेबसी में वो न रो पाता है, न चीख पाता है। प्रकृति कितने कम समय में कितना बड़ा बदलाव ला सकती है, ये उन बेबस आंखों से पूछिए, झपट्टा मार कर बारिश जिनका सब कुछ अपने साथ ले गई।
लेकिन प्रश्न यह है कि आधी रात को ये हुआ कैसे? क्यों शहर की सारी व्यवस्थाएं लड़खड़ा गईं? दरअसल शहर में बरसाती पानी की निकासी की कोई व्यवस्था है ही नहीं। जबकि लगभग तीन सौ साल पहले यह शहर व्यवस्थित ड्रेनेज सिस्टम के साथ ही अस्तित्व में आया था। दर्दनाक तथ्य यह है कि 1300 करोड़ का ड्रेनेज प्लान अफसरों-नेताओं के नाकारापन के चलते सात वर्षो से फाइलों में बंद है। हैरानी यह है, ऐसी हालत उस जयपुर शहर की है जिसकी शिनाख्त अब वर्ल्डक्लास सिटी के रूप में होनी है।
तो क्या यह शहर सिर्फ अपनी पुरानी झुर्रियां उतार रहा है? संकेत कुछ अच्छे नहीं हैं। बारिश रुकने के बाद बुधवार सुबह सिलसिला वहीं से शुरू हुआ। स्टीरियोटाइप बयान, लिपे-पुते बहाने, रटे-रटाए आरोप-प्रत्यारोप। प्रशासनिक-राजनीतिक अमला मरहम लेकर प्रभावित इलाकों में भी पहुंचा, लेकिन प्रश्न वही है कि राहत का कौन सा मरहम कारगर होगा और कौन मरहम लगाने के बहाने घाव को नासूर कर देगा। जाहिर है कुछ जांच-पड़तालें भी होंगी। अब तक सूखे से निपटने में लगी सरकार बारिश की बारीकियों को सुलझाने में लग जाएगी। क्योंकि आदत कोई नई तो नहीं है। 1981 में भी तो आई थी बाढ़ और कई बार पड़ चुका है अकाल।
दरअसल, आपदा से निपटने में हमारी सरकार की शपथ और प्रतिज्ञाएं इतनी कच्ची और गीली होती हैं कि वे कुछ ही दिन में लड़खड़ाने और भरभराने लगती हैं। हद तो उस दिन हो जाएगी जब कोई अधिकारी या जनप्रतिनिधि हमसे हाथ खड़े कर कह देगा- हम कुछ नहीं कर सकते। अगर बाढ़, बारिश या सूखे से कोई शिकायत है तो पहले थाने में प्राथमिकी दर्ज कराओ। हालांकि, आपदा के बीच सुकून यह भी है कि बारिश ने सूखी धरती को सरसब्ज कर दिया है। सालों बाद कई ताल-मावठें खुशियों से लबालब हैं।
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