पदोन्नति में आरक्षण मामले में बहस पूरी, अब फैसले की बारी
Source: Bhaskar News | Last Updated 00:20(09/02/12)
जयपुर. पदोन्नति में आरक्षण मामले में हाईकोर्ट में बहस पूरी हो गई है। न्यायाधीश एन.के.जैन व आर.एस.राठौड़ की खंडपीठ ने फिलहाल फैसला सुरक्षित रखा है। मुख्य न्यायाधीश के नहीं होने के कारण यह मामला मंगलवार को न्यायाधीश एन.के.जैन की खंडपीठ में सुनवाई के लिए गया।
खंडपीठ ने दो दिन तक राज्य सरकार तथा प्रार्थी समता आंदोलन समिति व अन्य का पक्ष छह घंटे तक सुना। गौरतलब है कि इन्हीं न्यायाधीशों की खंडपीठ ने दो साल पहले 5 फरवरी 2010 को प्रार्थियों के पक्ष में निर्णय दिया जबकि सरकार की तीन अपीलों को खारिज कर दिया था।
सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन ने कहा कि 11 सितंबर, 2011 की अधिसूचना अवमानना नहीं है और यह अदालत इसे नहीं सुन सकता। इसे अन्य याचिका से चुनौती दे सकते हैं ताकि एससी/एसटी वर्ग अपना पक्ष रख सके। यदि आरक्षण अधिनियम 2008 का पालन नहीं हुआ है तो अलग से याचिका दायर करें, ये 5 फरवरी 2010 के आदेश की अवमानना याचिका है ऐसे में 11 सितंबर की अधिसूचना का मुद्दा नहीं उठा सकते।
आरक्षण अधिनियम 2008 को चुनौती देने वाली याचिका में भी एससी/एसटी न तो आरक्षण को चुनौती नहीं दी है न ही भटनागर कमेटी का मुद्दा था। ऐसे में11 सितंबर की अधिसूचना सही है और इसमें आरक्षण को तय किया है।
प्रार्थी पक्ष की दलील: समता आंदोलन समिति व अन्य की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस.पी.शर्मा ने कहा कि मामले में अतिरिक्त महाधिवक्ता व वरिष्ठ अधिवक्ता किसकी ओर से आ रहे हैं क्योंकि मुख्य सचिव व प्रमुख कार्मिक सचिव ने तो अवमानना की है। प्रमुख कार्मिक सचिव खेमराज मामले में पक्षकार है और जानबूझकर अवमानना की है क्योंकि उन्हें कैप्टन गुरविन्दर मामले में दिए निर्णय का ध्यान था।
कार्मिक विभाग को यह अधिकार नहीं है कि वह विधायिका को है। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के आदेश को बहाल रखा है इसलिए कोर्ट प्रसंज्ञान लेकर अवमानना करने वाले अफसरों को सजा दे। अधिवक्ता शोभित तिवारी ने कहा कि 11 सितंबर की अधिसूचना विधि विभाग से अनुमोदित नहीं है इसलिए वह अवैध है और आदेश की अवमानना है।
दस महीने पहले दिए थे अवमानना नोटिस:
हाईकोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए दस महीने पहले 6 अप्रैल 11 को मुख्य सचिव सलाउद्दीन अहमद व प्रमुख कार्मिक सचिव खेमराज को अवमानना नोटिस जारी किए थे, अवमानना याचिका 16 अक्टूबर 2010 को दायर की थी।
यह था अदालत का आदेश
हाईकोर्ट ने5 फरवरी 2010 के आदेश से राज्य सरकार की 28 दिसंबर 02 एवं 25 अप्रैल 08 की अधिसूचनाओं को निरस्त कर दिया था। इस आदेश से सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को उनकी पुन:अर्जित वरिष्ठता प्राप्त हुई जबकि आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों को पारिणामिक वरिष्ठता का नुकसान हुआ। लेकिन सरकार ने आदेश का पालन करने की बजाय 11 सितंबर 11 की अधिसूचना जारी कर दी जिसमें 28 दिसंबर व 25 अप्रैल की निरस्त अधिसूचनाओं को वापस ले लिया।