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तीन साल बाद भी आईएएस पुत्र के साइन नहीं ले पाई पुलिस

श्रवणसिंह राठौड़ | Jul 31, 2012, 01:58AM IST
 
 

जयपुर.प्रदेश में भले ही लोकसेवा गारंटी अधिनियम लागू हो गया हो, लेकिन पुलिस की कार्यप्रणाली में कोई तत्परता नहीं आई है। खान में हिस्सेदारी डीड के विवाद में आईएएस अजीत कुमार सिंह के बेटे एकलव्य सिंह के हस्ताक्षर की सत्यता का पुलिस तीन साल बाद भी पता नहीं लगा पाई है।

प्रदेश के वरिष्ठ आईएएस अजीत कुमार सिंह एवं उनके बेटे एकलव्य सिंह के खिलाफ गांधी नगर थाने में पूर्व में दर्ज मुकदमे की अब पुन: जांच की जा रही है। पहले इसमें एफआर लग चुकी है। अब मुख्यमंत्री कार्यालय से भी इस मुकदमे की नए सिरे से जांच के लिए निर्देश दिए गए हैं।

आरोप है कि पुलिस दबाव होने की वजह से एकलव्य सिंह को बुलाकर उनके हिंदी में हस्ताक्षरों के नमूने लेने की जहमत नहीं उठा रही है। परिवादी बार-बार आरोप लगा रहा है कि हस्ताक्षर एकलव्य सिंह के नहीं होकर किसी दूसरे के हैं। ऐसे में एफएसएल से जांच कराई जाए। पुलिस की दलील है कि एकलव्य सिंह बयानों में पार्टनरशिप डीड पर खुद के ही हस्ताक्षर होना बता रहा है, ऐसे में कानून के मुताबिक उसकी मर्जी के खिलाफ हस्ताक्षर लेकर जांच नहीं कराई जा सकती है।

गांधी नगर थाने में दर्ज एफआईआर संख्या 335/2009 की एसीपी तेजराज सिंह अब नए सिरे से जांच कर रहे हैं। इस प्रकरण में पूर्व में पुलिस सिविल नेचर का बताते हुए अदालत में एफआर लगा चुकी है।

पुलिस विभाग के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक इस बार भी मुकदमे को सिविल नेचर का बताते हुए एफआर लगाने की तैयारी कर ली थी। तभी मुख्यमंत्री कार्यालय ने हाल ही निर्देश देकर नए सिरे से जांच करने को कहा है। मानसरोवर निवासी परिवादी देवेंद्र कुमार, किशोर कुमार, पृथ्वीराज आदि ने मुख्यमंत्री से पुलिस पर आईएएस अधिकारी अजीत कुमार सिंह के दबाव में काम करने की शिकायत की थी।

पूर्व में बिजनेस पार्टनर रहे इन हाईप्रोफाइल लोगों के बीच चल रहा यह पुराना विवाद बड़ा दिलचस्प है। आईएएस पक्ष की तरफ से होटल एवं खनन व्यवसायी देवेंद्र कुमार, किशोर कुमार, पृथ्वीराज, नरेश कुमार आदि पूर्व बिजनेस पार्टनरों के खिलाफ पूर्व में गांधी नगर और जैसलमेर के झिझनियाली थाने में धोखाधड़ी एवं मारपीट के मुकदमे दर्ज कराए गए थे, जिसमें तुरंत कार्रवाई करते हुए देवेंद्र कुमार और नरेश कुमार को गांधीनगर थाना पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था।

बाद में पुलिस दोनों ही मुकदमों को झूठा मानकर एफआर लगा चुकी है। गांधी नगर थाने में 183/2009 में दर्ज इस प्रकरण की बाद में सीआईडी सीबी ने जांच की, जिसमें देवेंद्र कुमार एवं नरेश कुमार दोनों की गिरफ्तारी को सही नहीं मानते हुए सीआरपीसी की धारा 169 के तहत रिहाई दे दी।

कानूनन जबरन हस्ताक्षर लेकर जांच नहीं करा सकते: गांधी नगर एसीपी तेजराज सिंह से सवाल

>आईएएस अजीत कुमार सिंह एवं उनके बेटे एकलव्य सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर 335/2009 में आरोप है कि पुलिस दबाव में है। अभी तक एकलव्य सिंह के आपने हस्ताक्षर क्यों नहीं लिए ?

इस प्रकरण में पूर्व में एफआर लग चुकी थी। अब रीओपन हुए इस प्रकरण की फिर से जांच की जा रही है। पुलिस पर भला क्या दबाव होगा। एकलव्य सिंह ने पुलिस को दिए बयानों में लीज डीड पर खुद के हस्ताक्षर होना बताया है। कानून में जबरन किसी के हस्ताक्षर लेकर जांच कराने का कोई प्रावधान नहीं है। दोनों पक्षों के बीच हस्ताक्षर के जरिए एग्रीमेंट हुआ था, इससे कोई मना नहीं कर रहा है। ऐसे में हस्ताक्षर एकलव्य सिंह ने किए हैं या उनके किसी परिजन ने। इसका घाटे या लाभ से कोई लेना देना नहीं है।

>अब तक की जांच में क्या सामने आया ?

जांच गोपनीय होती है। जो भी सामने आएगा, उस बारे में अदालत को अवगत करा दिया जाएगा।

आईएएस पुत्र ने पुलिस को दिए ये बयान

इस प्रकरण में गांधीनगर एसीपी तेजराज सिंह ने आईएएस के बेटे एकलव्य सिंह को नोटिस देकर तलब किया था। रिकॉर्ड के मुताबिक 27 मार्च2012 को वो पुलिस के समक्ष पेश हुआ। जिसमें एकलव्य सिंह ने बयानों में कहा कि पार्टनरशिप डीड पर जो हस्ताक्षर हैं, वो उसके ही हैं। पिताजी के हस्ताक्षर होने का आरोप पूरी तरह झूठा है।

एकलव्य सिंह ने यहां तक बयानों में कहा कि जिस दिन पार्टनरशिप डीड पर हस्ताक्षर करके मेरा हक समाप्त होना बताया जा रहा है, उस दिन एक अप्रैल, 2005 को वो सिंगापुर में था। जिसकी तस्दीक पासपोर्ट से की जा सकती है। एकलव्य सिंह का कहना है कि कूटरचित दस्तावेजों के जरिये ही उसको फर्म से रिटायर होना दर्शाया गया है। पार्टनरशिप में हिस्सेदारी देते समय जो हस्ताक्षर किए थे, वो एकलव्य सिंह खुद के ही होना बता रहा है।

बदनाम करने की साजिश

'सरकारी अफसर होने की वजह से मर्यादाओं की पालना करनी पड़ती है। एफआईआर दर्ज कराने वाला पक्ष खुद ही गुंडागर्दी कर रहा है। बेटे एकलव्य सिंह पर जो भी आरोप लगाए गए हैं, वे सारे ही निराधार हैं। कई बार पुलिस से जांच हो चुकी है। आरोपों में जरा भी सच्चाई होती तो जांच में सामने आ जाता। यह बदनाम करने की साजिश है।'

- अजीत कुमार सिंह,
प्रमुख शासन सचिव (विभागीय जांच)
 
 
 

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