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रोज करते हैं जिंदगी से जंग ताकि मुकाबला कर सकें मौत से
Bhaskar News | Jan 26, 2013, 04:40AM IST

जोधपुर.दईजर फायरिंग रेंज में देश के चुनिंदा 216 कमांडो के साथ चार घंटे बिताने के बाद महसूस हुआ कि आंतरिक सुरक्षा के लिए ये जवान रोज जिंदगी से जंग लड़ते हैं, ताकि किसी भी पल मौत से मुकाबला कर सकें। हर किसी के जीवन में बीस से तीस साल की उम्र सबसे स्वर्णिम होती है, मगर इन जवानों ने जिंदगी के इन पलों को देश के नाम कर रखा है।
इन कमांडो के रोजाना सुबह सात बजे से शाम पांच बजे तक लगातार पसीना बहाने का ही नतीजा है संसद, अक्षरधाम, और मुंबई हमले जैसी आतंकी घटनाओं का हम मुकाबला कर पाए हैं। जम्मू-कश्मीर, असम और झारखंड के कमांडो तो हर रोज उग्रवादियों से लोहा लेकर अवाम की हिफाजत कर रहे हैं।
सैकंडों में होती है कमांडो की गिनती
अभ्यास के बाद थकान उतारने के लिए कैंप में सुस्ता रहे कमांडो बताते हैं कि उनकी गिनती सैकंडों में होती है। महज तीन सैकंड में पांच राउंड फायर कर दुश्मन को ढेर करने का टास्क लेकर चलते हैं। यदि टास्क पूरा नहीं हुआ तो समझो जिंदगी से हाथ धो बैठे। ऑपरेशन के दौरान चौकस निगाहें चारों ओर इतनी तेजी से घूमती हैं कि मशीन को भी मात दे जाएं । ट्रेनिंग का मुख्य हिस्सा यह भी है कि दुश्मन को मारने के साथ अपने साथी को प्रोटेक्ट करना सबसे जरूरी है।
ट्रेनिंग का दूसरा नाम जिगर खोलना
मौत से लड़ने में हौसला चाहिए, इसके लिए जिगर ट्रेनिंग से ही खुलता है। कमांडो ट्रेनिंग देने वाले मेजर दलवीर सिंह बताते हैं कि अभ्यास के दौरान 30-40 फीट की ऊंचाई से कूदते समय नीचे जाली व गद्दे लगे होते हैं। कमांडो को पता होता है कि उसे चोट नहीं लगेगी, मगर इस ऊंचाई से कूदने में जिगर चाहिए।
ट्रेनिंग में जब भी कोई कमांडो हिचकिचाता है तो उसका साथी ही उसे धक्का दे देता है। जैसे ही वह नीचे गिरता है, उसका जिगर खुल जाता है और वह तुरंत खुद छलांग लगा लेता है। यही हौसला तो मुठभेड़ के वक्त चाहिए, मौत सामने हो तो दुश्मन को मारने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं बचता है।






