तिनके की तरह कांप रहा मेरा वजूद
Source: ओम कटारा | Last Updated 06:53(08/02/12)
कोटा में औद्योगिक विकास की बयार चली तो मैंने भी सुनहरे अरमानों और कुलांचे भरती नई तकनीक के साथ 18 साल पहले चंबल किनारे इस शहर में कदम रखे थे। उस समय सेमकोर नाम था मेरा जो बाद में बदलकर सेमटेल हो गया। तब से आज तक मेरा वजूद कायम रखने के लिए क्या-क्या नहीं देखना पड़ा मुझे।
तीन बार मुसीबतों का ऐसा पहाड़ टूटा कि लगा अब सांसें थमने वाली है। लेकिन दुआ है आपकी जिसने कठिन संघर्षो के झंझावातों में भी न सिर्फ मुझे जिंदा रखा बल्कि मेरे वजूद के साथ स्थाई-अस्थाई रूप से जुड़े कामगारों व 4 हजार लोगों के परिवारों का दाना-पानी भी नहीं छिनने दिया। जी हां!
टीवी की पिक्चर ट्यूब के फनल (ग्लास) बनाने वाला आपका अपना सेमटेल हूं मैं। अब फिर से वही झंझावात और भीषण आंधी का दौर दो माह से चल रहा है, जिसमें मेरा वजूद तिनके की तरह कांपने लगा है। मशीनों की घरघराहट थमने के साथ ही सैंकड़ों कामगारों के कलेजे चाक हो रहे हैं। उनके परिवारों पर मंडरा रहा है घोर अंधेरे का राक्षस।
विश्वास नहीं हो तो पूछ लो मेरी जड़ों को पसीने से सींचने वाले मशीन ऑपरेटर मिलन शर्मा, अशोक सेन, रविशंकर, रामजीवन, वेणु गोपालन और रियाज मोहम्मद जैसे कामगारों से, जिनके घरों में रोजगार छिनने का मातम छा रहा है। इनके घर के चूल्हों की तपिश कम होने लगी है तो खाली हो रहे आटा-दाल के कनस्तर जिंदगी के अस्तित्व को लेकर यक्ष प्रश्न पूछ रहे हैं।
कल तक आंगन में चहकते-कूदते और किताबों का बस्ता जमाकर स्कूल कॉलेज जाते बच्चों की पेशानी पर पड़ी सलवटें सवाल पूछ रही है कि अब उनका क्या होगा। देश के हर प्रदेश के कामगार की मेहनत का आइना है मेरा वजूद। कोटा के बाजार की आर्थिक रौनक में हर माह दो से तीन करोड़ रुपए की रंगत बिखेरता हूं मैं।
आप लोगों को देश-दुनिया की हलचल दिखाने और मनोरंजन से सराबोर करने वाले टीवी की आत्मा में निवास किया था मैंने। श्वेत श्याम रंग के टीवी के जमाने से लेकर अब रंगीन टीवी की पिक्चर ट्यूब के ग्लास बनाकर दुनिया की रंगीनियत दिखाने लगा था मैं। आर्थिक मंदी के दौर में भी मुस्कुराता रहा, लेकिन अब क्या होगा, यह सोचकर कांप रहा है मेरा वजूद। शासन प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और शहर के जिम्मेदार लोगों की चुप्पी आंखों में आंसू ला देती है मेरे।