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ऑफ द रिकॉर्ड:जनहित बड़ा या कानून

श्याम आचार्य | Sep 13, 2012, 04:14AM IST
 
 


चौधरी कुंभाराम, सुखाड़िया मंत्रिमंडल के सदस्य थे। उनके पास सहकारिता विभाग भी था। एक बार जब वे गांव से जयपुर आए तो सचिवालय में उनके सचिव ने गांव के लोगों की व्यथा-कथा सुनाई। सचिव ने इसका कारण कानूनी अड़चनें एवं पेचीदगियां होना बताया। चौधरी ने उनसे कहा वे कानून की किताब को लेकर आएं।

सचिव महोदय जब कानून की किताब लेकर सामने की कुर्सी पर बैठ कर उसके पन्ने पलटने ही लगे थे तो चौधरी ने उन्हें पीछे खड़े होकर कानूनी धारा पढ़ने को कहा। सचिव पीछे खड़े होकर झुककर जैसे ही उस कानूनी किताब की धारा पढ़ने लगे चौधरी ने लाल पेंसिल उठाकर, सचिव जिस लाइन को पढ़ते उसे काटते गए। जब सचिव ने पढ़ना बंद कर दिया तो चौधरी ने कहा -‘अब इसे फिर से पढ़ो’ तो सचिव ने कहा -‘अब क्या पढूं?’ जो पढ़ा वह तो आपने काट दिया ।

इस पर चौधरी ने कहा -‘आप इधर आकर बैठिये। जब वे बैठ गए तो बोले- ये कायदे कानून हमने बनाए हैं । उन्हें रद्द करने का अधिकर भी हमारे पास है। आप अब अपना नोट तैयार करके लाइए, ताकि उसे मैं केबीनेट में रख कर कानून में संशोधन करा सकूं। चौधरी ऐसे जनहित में रोड़ा अटकाने वाले कानून को शीघ्रताशीघ्र बदलने के पक्षधर थे। उनके स्मृति ग्रंथ में ऐसी कई घटनाओं के उल्लेख हैं।’

 
 
 

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