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कल जिस पानी से था तबाही का ख़तरा, आज वही वरदान बन भर रहा है भण्डार
कुलदीप पारीक/मुकेश | Aug 05, 2012, 00:18AM IST

पिछले साल तो यह परेशानी उनके लिए सदमे से कम नहीं थी। बारिश ज्यादा हुई तो बरसाती पानी ने उनकी आठ बीघा में खड़ी फसल ही नहीं बल्कि बाकी रकबे में लगाए एलोविरा को भी उजाड़ दिया। लाखों का नुकसान हो गया।हताश-निराश हो गए। कृषि के जानकारों से राय ली तो राह निकली कि क्यों न इस पानी को एक जगह इकट्ठा कर लिया जाए।
सलाह मशविरा किया तो एक सरकारी योजना भी मिल गई। 50 हजार रुपए का अनुदान मिलाकर करीब 2 लाख की लागत से 4 लाख लीटर क्षमता का टैंक खेत में बना लिया। सारा पानी इसी में इकट्ठा करने लगे। खेत में लहलहाती बाजरे और ग्वार की फसल देखकर इस साल उनके चेहरे पर चमक है। उनको बरसों बाद खरीफ की पैदावार मिलने की उम्मीद है। सागरमल ने इस प्रयोग और खुशी को भास्कर से बांटा। बोले, हर साल फसल नष्ट होते देख जी दुखता था।
टैंक बनने से न केवल खरीफ की फसल तबाह होने से छुटकारा मिला बल्कि रबी की फसल में भी सिंचाई के लिए पानी की कमी नहीं पड़ती। कहते हैं, मैं तो पड़ोसी खेतों को भी पानी दे देता हूं।अब वे पशु चलित पंप से बूंद बूंद सिंचाई संयंत्र के जरिए पानी को सिंचाई के उपयोग में लाने की योजना पर काम कर रहे हैं। 1998 से 2005 तक (जैव ऊर्जा आधारित) पशु चलित पंप का उपयोग कर उसे राष्ट्रीय नवाचार रजिस्टर में शामिल करवा चुके हैं।
दुर्घटना के बाद दवा और अब मोटी कमाई
दुर्घटना में फ्रैक्चर पैर और दर्द से तंग आ चुके किसान ने एलोवेरा (ग्वार पाठा) का दवा के रूप में उपयोग किया। बचे हुए को कचरे में फेंक दिया। बारिश के बाद उसके तीन पौधे तैयार हुए तो उन्हें खेत में लगा दिया। इसी से प्रेरित होकर वे एलोवेरा, लेमन घास सहित कई उद्यानिकी फसल ले रहे हैं। अब तक करीब चार लाख एलोवेरा के पौधे बेच भी चुके हैं।






