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Home >> Rajasthan >> Sikar >> Afzal's Death Due To Delay In Honoring The Martyr's Wife Had Returned

अफजल की फांसी में देरी के कारण शहीद की पत्नी ने लौटा दिया था सम्मान

Bhaskar News | Feb 10, 2013, 03:23AM IST
 
 

 
सीकर/जयपुर.एक-एक दिन, एक-एक पल जिस बात का मुझे इंतजार था, वह आज पूरी हो गई। वो फांसी का ही हकदार था। एक शहीद के परिवार को इससे ज्यादा क्या चाहिए। अब मैं बहुत खुश हूं। 
 
सरकार उसे फंदे पर नहीं लटका रही थी, इसी कारण मैंने अपने पति की शहादत के लिए मिला अशोक चक्र भी दिल्ली जाकर लौटा दिया था। लेकिन आज मुझे फक्र है। मुझे अब मेरे पति की बहादुरी की निशानी चाहिए। मैं इसे लेने दिल्ली जाऊंगी। बेटे गौरव को सेना में भेजूंगी। मेजर बनाऊंगी। 
 
संसद हमले में शहीद हुए नीमकाथाना (सीकर) निवासी जेपी यादव की पत्नी प्रेमदेवी को जैसे ही सूचना मिली कि आतंकी अफजल गुरु को फांसी दे दी गई है तो उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक गए। वे फिलहाल जयपुर में वीकेआई रोड नंबर 5 स्थित शिव विहार में 16 साल के बेटे गौरव और 13 साल की बेटी गरिमा के साथ रह रही हैं।
 
प्रेम देवी ने कहा- संसद हमले के दिन मैं नीमकाथाना में अपने ससुराल में थी। हमले में मेरे पति शहीद हो गए थे। मुझे शाम तक किसी ने नहीं बताया।
 
उस समय बेटा गौरव चलना सीख रहा था और बेटी गोद में थी। सास-ससुर बुजुर्ग थे। सरकार ने सहायता दी। 2002 में पति की बहादुरी के लिए अशोक चक्र दिया गया, लेकिन मैं और मेरा परिवार केवल यही चाहते थे कि गुनहगारों को जल्द से जल्द फांसी मिले, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
 
हर साल 13 दिसंबर को श्रद्धांजलि देने के लिए दिल्ली से बुलावा आता। हम श्रद्धांजलि देकर लौट आते। तीन साल ऐसे ही यही चलता रहा। आखिरकार अशोक चक्र लौटा दिया, ताकि सरकार व लोगों तक हमारा दर्द पहुंचे। 9 और परिवारों ने भी ऐसा ही किया। देर से ही सही अब हमें सच्च सम्मान मिल ही गया। देश के दुश्मनों को मिटाने के लिए ही तो सैनिक पैदा होते हैं और शहीद होते हैं। शहीद के परिजन ऐसा ही सम्मान चाहते हैं।
 
जान देकर बचाईं कई जिंदगियां
 
जेपी यादव संसद भवन के सहायक सुरक्षा सहायक थे। 13 दिसंबर 2001 को वे संसद के गेट नंबर 11 व 12 में उपराष्ट्रपति के प्रस्थान की व्यवस्था देख रहे थे। सुबह करीब 11: 40 बजे एक कार तेजी से गेट 11 की ओर बढ़ती दिखाई दी। यादव कार की ओर बढ़े तभी उसमें से आतंकियों ने अंधाधुंध गोलियां चला दीं। यादव निहत्थे थे। जान की परवाह नहीं करते हुए गेट नंबर 12 की ओर तेजी से दौड़े। लोगों को चौकन्ना किया। कई जिंदगियां बचाई, लेकिन खुद शहीद हो गए।
 

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