इस शोक से सबक लेना होगा

एक ऐसी मौत जिस पर सारा देश दुखी है। एक ऐसी मृत्यु जो पूरे देश के लिए एक सबक है। यह वक्त है जब बच्चियों की सुरक्षा, उनके आत्मसम्मान और पारिवारिक सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव को लेकर शुरू हुई बहस को एक वाजिब अंजाम तक ले जाया जाए।
बीती 16 दिसम्बर को दिल्ली की एक चलती बस में पीडि़त के साथ हुए इस राक्षसी कृत्य ने हर उस भारतीय के मन को हिला दिया, जो जरा भी संवेदनशील है। आजाद भारत के इतिहास में यह पहली ऐसी घटना थी जिसने देश की ज्यादातर महिलाओं और लड़कियों में एक नई सामाजिक क्रांति की लहर पैदा कर दी। अब उसकी मौत निश्चित तौर पर कई बदलावों का सबब बन सकती है।
खासतौर पर परिवारों के भीतर लड़कियों की स्थिति और समाज में उनके प्रति बरते जाने वाले रवैये के मसले पर। यह बहुत ही नाजुक वक्त है। छोटी बच्चियों से लेकर महिलाओं तक के मन में एक अजीब सा डर है। इस डर को दूर करने की जि मेदारी समाज, कानून व्यवस्था और सरकारों की है। इस प्रकरण के आरोपियों को तो गिरफ्तार किया जा चुका है। उन्हें फांसी जैसी कड़ी सजा मिलने की भी पूरी संभावना है पर सिर्फ यही काफी नहीं होगा।
दरअसल अब हर शहर और गांव में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों पर पूरी संवेदनशीलता से नजर रखने की जरूरत है। मामूली छेड़छाड़ से लेकर उत्पीडऩ की बड़ी घटनाओं तक पर कानून को स त होना पड़ेगा। ऐसे अपराधों के खिलाफ लड़ रही महिलाओं को पूरा संरक्षण देना होगा। परिवारों के भीतर दिए जाने वाले संस्कारों में भी बेटे बेटी के भेदभाव को खत्म करने की जरूरत है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होगा तो बच्चियां घरों से ही असुरक्षा का भाव लेकर बाहर निकलेंगी।
उदयपुर संभाग में भी सरकारी अफसरों, गैर सरकारी संगठनों और समाजसेवियों को अपनी तरफ से पहल करनी होगी। अगर उनके मन में वाकई दिल्ली दुष्कर्म पीडि़त को लेकर जरा भी दुख है तो उन्हें अपने शहर, गांव और आसपास की उन महिलाओं को न्याय दिलाने की कोशिश करनी होगी जो पुरुषवादी समाज में अपने साथ हुए अत्याचार की लड़ाई को लडऩे की हि मत कर रही हैं।








