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टिप्पणीः सिर धुनने के लिए, हाथ मसलने के लिए

 
Source: कमलेश सिंह   |   Last Updated 03:31(10/02/12)
 
 
 
 
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देशभर में बदनाम और लोकतंत्र के लेटेस्ट कलंक लक्ष्मण सावड़ी कहते हैं उन पर लगे आरोप निराधार हैं। उनकी बात निराधार नहीं है। जिस दिन लोकतंत्र की मर्यादा एक बार फिर कर्नाटक में तार-तार हुई, उस दिन विधान सभा में लक्ष्मण सावड़ी नहीं बैठा था।


 

दरअसल सहकारिता मंत्री होते हुए भी लक्ष्मण सावड़ी विधान सभा के अंदर कभी नहीं बैठा। वो तो अथानी विधान सभा क्षेत्र के 168608 मतदाता बेंगलूरू के विधान सौध में नहीं समा सकते, इस लिए उनका प्रतिनिधि वहां बैठता है।


 

लक्ष्मण सावड़ी एक वचन नहीं, बहुवचन है। आरोप पूरे अथानी पर है, सावड़ी नितांत घटिया चरित्रहीन है। जब कोई सुरेश कलमाडी या ए राजा कानून की गिरफ्त में आकर जेल जाता है तो कठघरे में वह भी होते हैं जिन्होंने उनकी बेईमानी पर ईमान रखा होता है।


 

एक अरसा हो गया है हमने अपनी आंखों से देखा है किस तरह ये गठजोड़ उसी लोकतंत्र की जड़ें खा रहा है, जिसे इस देश के एक अरब बीस करोड़ लोग अपने पसीने से सींचते हैं। अपनी गलियों में हम सुरक्षित महसूस नहीं करते उनके गुर्गों से जिन्हें हमने राजधानी भेज दिया।


 

रोजमर्रा के जरूरत की चीजें हमारे पहुंच से दूर होती जाती हैं क्योंकि उनकी नीतियां उनके नाजायज हिस्से के तराजू पर तुली होती है. दबंगों का अश्लील रूतबा देख जवान होते बच्चे दबंग बनना चाहते हैं, और पीढ़ियां अब वो सीढ़ियां उतर रही हैं जो सभ्यता पर सवाल उठाती हैं।


 

आदर्श की परिभाषा बिगड़ गई है, समाज का व्याकरण ही अपराध और भ्रष्टाचार के संधि-समास में गुम हो गया है। क्योंकि हम अपराध और भ्रष्टाचार, नैतिक और चारित्रिक पतन की जिम्मेदारी नहीं लेते। इस सोच ने हमको वहां ला खड़ा किया, जहां हम आज हैं। शर्मसार, घृणा से भरे, गुस्से से उबलते और हाथ मलते। शेर अर्ज है..


 

अपने खिलाफ फैसला खुद ही लिखा है आपने, अब हाथ मल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं।


 

लोकतंत्र पर तंज करते हुए अल्लामा इकबाल ने कहा था कि जम्हूरियत वो तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें, बन्दों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते। बंटवारे के वक्त अल्लामा ने पाकिस्तान चुना, पर दोनों नए मुल्कों ने उनकी नहीं सुनी और सही को चुना।


 

तारीख तब तक कई निजामों को आजमा चुकी थी पर जम्हूरियत से बेहतर कोई निजाम नहीं। आज अल्लामा कब्र में इस मुद्रा में मुस्कुरा रहे होंगे, कि हमने कहा था ना? वो दुर्गत बनाई है हमने उस सौगात की जिसके लिए उनका पाकिस्तान कितनी कुर्बानियां दे चुका है और चीन-ओ-अरब में लोग अपने प्राणों की आहुति दे रहे हैं. बकौल इकबाल हम बुलबले हैं इसकी, ये गुलिश्तां हमारा. पर ये जुमला भी उन्हीं का है कि हर शाख पे उल्लू बैठे हैं..


 

अंजामे गुलिश्तां ये है कि लोकतंत्र की देवी को जिस मंदिर में स्थापित किया वहाँ उसके मठाधीश बालाओं के बलात्कार की फुटेज देख रहे हैं. कोई नोट उछाल रहा है, कोई जूते-चप्पल, कोई विधेयक की प्रतियां फाड़ रहा है तो कोई हमारे भरोसे को. भ्रष्टाचार के खिलाफ उठे जनाक्रोश के बाद भारत को यह एहसास तो हो गया है कि हमने गलतियाँ बहुत की हैं. पर उन गलतियों से सीख ली है क्या?


 

अभी पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, जनता जाग गई है पर इस का डर बना हुआ है कि कुछ और लक्ष्मण सावदी चुन लिए जाएंगे. हम फिर पछताएंगे और उसको कोसेंगे. उसके पकड़े जाने पर कुर्सी उस की जाएगी, इज्ज़त हमारी पर इस से इनकार करते रहेंगे कि हम वो हैं जो उस फुटेज में लुट रही है जिसे देखकर सावदी की लार टपकी थी. लुटेरे लक्ष्मण सावदी पर लगे आरोप निराधार हैं, हम गुनाहगार हैं. लक्ष्मण सावदी तो एक नितांत घटिया चरित्रहीन है.


 

भास्कर श्रंखला-भाग 1 : नेतृत्व का नैतिक पतन


 

आरोपों के किस्से बनकर रह गईं कलंक की अनगिनत कहानियां


 

कलंकित नेता बने ही रहेंगे, यदि हम सहन करते रहेंगे

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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