नई दिल्ली. 2 अप्रैल 2011 को भारत ने जब क्रिकेट विश्वकप जीता था तब ही सचिन को संन्यास ले लेना चाहिए था। लेकिन सचिन ने ऐसा नहीं किया, वह अब निश्चित ही अपनी उस गलती पर खुद को कोस रहे होंगे। पाकिस्तान के प्रमुख अखबार डॉन के संपादकीय में यह बात कही गईं है। इस संपादकीय में इंग्लैंड के खिलाफ चल रही सीरीज में भारत के लचर प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए कहा गया है कि सचिन का प्रदर्शन इतना नीचे गिर जाने से न सिर्फ दुनियाभर में उनके लाखों प्रसंशक खफा है बल्कि चयनकर्ता भी उन्हें संन्यास लेने के लिए कहने पर मजबूर हो गए हैं।
संपादकीय में कहा गया, 'सबसे महान क्रिकेटर माने जाने वाले सचिन तेंडुलकर चार टेस्ट मैचों की सीरीज में दया के पात्र बन गए। वो ऐसी टीम के सामने संघर्ष करते नजर आए जो किसी भी रूप में उनकी क्लास और रुतबे की बराबरी नहीं करती।'
यही नहीं 2012 में लगातार नाकाम हो रहे तेंडुलकर को कई मौकों पर दर्शकों की हूटिंग का भी शिकार होना पड़ा। मुंबई, नागपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों में, जहां उन्हें पूजा जाता है, वहां भी उन्हें हूटिंग का शिकार होना पड़ा। संपादकीय में आगे कहा गया, 'सचिन के पूर्व साथी भी अब खुलकर उनकी आलोचना कर रहे हैं। राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली जैसे क्रिकेटर उनके धीमे पड़ रहे रिफ्लेक्सेज और खराब शॉट सलेक्शन के लिए अब सार्वजनिक टिप्पणियां कर रहे हैं।'
हालांकि ऐसी स्थिति का सामने करने वाले सचिन पहले एशियाई क्रिकेटर नहीं है। इससे पहले कई महान क्रिकेट खिलाड़ियों को ऐसे दौर से गुजरना पड़ा है। सुनील गावस्कर, कपिल देव, जावेद मियांदाद, वसीम अकरम और जहीर अब्बास को लगातार खराब प्रदर्शन के बाद या तो संन्यास लेने के लिए मजबूर किया गया या फिर वह खुद ही चमक-धमक से दूर हो गए।
अखबार ने अपने संपादकीय में आस्ट्रेलियाई पूर्व कप्तान रिकी पोंटिंग का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे ही उन्हें अपने खराब फॉर्म का अहसास हुआ उन्होंने क्रिकेट को अलविदा कह दिया। लेकिन तेंडुलकर अपनी विदाई का गौरवपूर्ण लम्हा चुनने में नाकाम रहे, अब वह अपनी उस गलती पर पछता रहे हैं जो उन्होंने विश्वकप जीतने के बाद संन्यास न लेकर की।
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