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जानवरों के अंडकोष कच्चा खा जाते थे खिलाड़ी

BBC | Aug 05, 2012, 00:53AM IST
 
 


खेल, खिलाड़ियों और शक्तिवर्धक खुराक का बड़ा पुराना नाता है, कभी ये तरह-तरह के भोजन से मिलता है तो कभी दवाओं से।

 

खेलों को प्रतिस्पर्धात्मक बनाए रखने के लिए और हर खिलाड़ी को बराबरी का मौक़ा देने के लिए आयोजकों ने तरह-तरह की बंदिशें लगाईं लेकिन जितनी बंदिशें लगीं, खिलाड़ियों ने भी गोलियों, इंजेक्शनों और हारमोंस के रूप में नए-नए तरीके निकाल लिए।

 

आपको थोड़ी हैरानी होगी लेकिन यह सच है कि प्राचीन ओलंपिक खेलों में डोपिंग होती थी और खिलाड़ी अपने प्रदर्शन को मजबूत करने के लिए जानवरों के अंडकोष कच्चा चबाकर खा जाया करते थे।

 

जाहिर है कि ओलंपिक में भी पीने-खाने की दवाओं के अलावा शक्तिवर्धक दवाओं का प्रचलन इन खेलों जितना ही पुराना है।

 

डोप हमेशा से

 

ब्रिटेन की साउथैंप्टन यूनिवर्सिटी में ओलंपिक इतिहासकार मार्टिन पॉली ने समाचार एजेंसी रायटर्स को बताया, “डोपिंग हमेशा से ही ओलंपिक का हिस्सा रही है. लेकिन ड्रग्स को खेलों में कभी बड़ी समस्या नहीं माना गया. लेकिन अब यह बड़ी चिंता बन गई है”

 

"डोपिंग हमेशा से ही ओलंपिक का हिस्सा रही है. लेकिन ड्रग्स को खेलों में कभी बड़ी समस्या नहीं माना गया. लेकिन अब यह बड़ी चिंता बन गई है"-ओलंपिक इतिहासकार मार्टिन पॉली

 

पॉली ने कहा, “यकीनन हर हाल में जीतने की ललक इतनी जबरदस्त होती होगी कि खिलाड़ी जानवरों के अंडकोष कच्चे ही चबा जाते थे. हालांकि संभव है कि इसे मर्दाना ताकत बढ़ाने के तरीके के रूप में देखा जाता हो”

अब फर्क इतना है कि मौजूदा ड्रग्स काफी सुरक्षित, पकड़ में न आने वाले और व्यवहारिक हैं।

 

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की स्पोर्टस मेडिसन एक्सपर्ट वनेसा हैगी ने कहा, “1896 में शुरुआती ओलंपिक में खिलाड़ियों को दवाएं, टॉनिक व अन्य शक्तिवर्धक तत्व लेने की पूरी आजादी थी।”

 

हैगी ने एक साक्षात्कार में बताया कि उन दिनों थकान और दर्द को दूर करने के लिए कोकीन के टिंचर और शराब के घूंट दवा के तौर पर लेना आम बात थी।

 

वे कहते हैं कि खिलाड़ियों को बाकियों की तरह अपने दर्द को दूर करने की इजाजत हुआ करती थी।

 

जैसे जैसे खिलाड़ियों का ऐसी दवाओं को लेने का इरादा और नजरिया बदलता गया, यह भी तय होने लगा कि उन्हें कैसी दवाएं लेनी चाहिए।

 

रुख बदलाडोपिंग के नए नए तरीक़े निकलते रहे हैं

 

 

हैगी ने कहा, “खेलों में नशीली दवाओं का स्वरुप समय के साथ बदला है. कई बार इनका प्रयोग दवा के तौर पर होता है, कई बार खाने के तौर पर और कई बार इसका इस्तेमाल खिलाड़ी अपना प्रदर्शन और पैना करने के लिए करते हैं।”

 

उन्होंने आगे कहा कि एल्कोहल इसका सबसे अच्छा उदहारण है, कई बार विजेता इसे दवा के तौर पर पीते थे. यह एक तरह का खाद्य पदार्थ भी है. आम आदमी इसे शौकिया पीता था।

 

पॉली बताते हैं, “ड्रग्स खिलाड़ी के शरीर पर कितना बुरा असर डाल सकते हैं, इस चिंता के साथ ही खेलों में ड्रग्स को लेकर रुख बदलने लगा। ”

 

इस संदर्भ में उन्होंने 1960 के रोम ओलंपिक में डेनमार्क के साइक्लिस्ट कनुड इंमार्क की मौत का जिक्र किया।

 

इंमार्क की मौत इंमपेथेमाईंस के कारण हुई. उनकी मौत एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुई क्योंकि इसके बाद अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी डोपिंग को लेकर काफी सख्त हो गई।

 

इसके बाद से खेलों में डोपिंग के खिलाफ लड़ाई काफी तेज हुई. जांच के लिए विज्ञान की मदद ली जाने लगी।

 

लेकिन ऐसे धोखेबाज खिलाड़ी भी इस पूरी मुहीम के लिए चुनौती होते गए जो हमेशा एक कदम आगे रहते हैं।

 

नए-नए तरीके

 

"यह एक ऐसी दौड़ है जो लगता नहीं कि हम कभी जीतेंगे" -वनेसा हैगी

 

इस दिशा में 1970 और 80 के दशक में खिलाड़ियों का ब्लड डोपिंग को अपनाना सबसे बड़ा उदहारण है।

 

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी ने 1986 में ब्लड डोपिंग पर प्रतिबंध लगा दिया लेकिन 2000 के सिडनी ओलंपिक तक कमेटी ब्लड ड्रग आर्थरोपोइटीन (ईपीओ) की विश्वसनीय जांच के लिए कोई प्रणाली स्थापित नहीं कर पाई थी।

अब एंटी डोपिंग एजेंसी ने सैकड़ों दवाओं को प्रतिबंध की सूची में डाला है।

 

इसके अलावा लंदन ओलंपिक की जांच प्रयोगशाला में लिक्विड क्रोमाटोग्राफी और मास स्पेक्ट्रोमेट्री टेस्टिंग उपकरण 24 घंटे 240 प्रतिबंधित दवाओं का पता लगाने के लिए 400 सैंपल टेस्ट कर सकते हैं।

 

लेकिन ओलंपिक इतिहासकारों का मत है कि डोप लेने वाले खिलाड़ी हमेशा एक कदम आगे रहेंगे।

 

हैगी ने इस चिंता पर कहा, “यह एक ऐसी दौड़ है जो लगता नहीं कि हम कभी जीतेंगे।”

 
 
 

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