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पहली बार 5-स्टार हुआ कुंभ, कॉटेज किराया 35,000 रोज

विजय मनोहर तिवारी | Feb 17, 2013, 07:26AM IST
इलाहाबाद. चार सौ वर्गफुट का खासतौर से डिजाइन टेंट। भीतर एकदम नया फर्नीचर। कालीन। टीवी। राजसी ड्रेसिंग सेट। फोन। वुडन फ्लोर। अटैच वॉशरूम। एक विशाल टेंट में शानदार डाइनिंग हॉल। प्रात: योगाभ्यास। दोपहर संगम पर नौका विहार। भारतीय परंपराओं की झलक दिखाने के लिए संध्या समय हवन। वेदांत चर्चा। भजन। योग, ज्योतिष और आयुर्वेद के विशेषज्ञों की सेवाएं। इलाहाबाद, लखनऊ और वाराणसी एयरपोर्ट पर ही अतिथियों का स्वागत व विदाई। 
 
कुंभ में आराम के ऐसे आलीशान इंतजाम पहली बार देखे गए हैं। तीन श्रेणियों में छह हजार से 35 हजार रुपए रोज के करीब एक दर्जन आवासीय परिसर कुंभ का एक नया परिचय हैं। वेबसाइटों के जरिए पिछले डेढ़ साल में जबर्दस्त मार्केटिंग। इनमें से कुछ आसपास निजी जमीनों पर बने हैं तो कुछ साधु-संतों को मुफ्त में मिली सरकारी जमीन पर। सभी धर्म के साथ कारोबार की वैतरणी पार करने की कोशिश में हैं। गंगा पार ऐतिहासिक समुद्र कूप आश्रम में सरसों के खेत पर सबसे भव्य 50 लक्ष्मी कुटीरों को दिल्ली के आर्किटेक्ट ने डिजाइन किया। अजमेर से फर्नीचर व टेंट आए। बिहार में गया के पास टिकारी राजपरिवार की लक्ष्मीसिंह ने करीब छह कंपनियों के साथ मिलकर यह व्यावसायिक पहल की। सारी कुटीरें पैक हैं। वे कहती हैं, ‘विदेशी पर्यटक कुंभ में आते ही हैं। उन्हें सुविधाएं चाहिए। नई बात यह है कि भारतीय श्रद्धालुओं ने भी इन भव्य बसाहटों में रुचि दिखाई। बुकिंग कराने वालों में 40 फीसदी भारतीय हैं।’ 
 
वे स्थानीय कारोबारी सबसे ज्यादा खुशनसीब रहे, जिनकी कुंभ मेले के आसपास अपनी जमीनें हैं। एयरफोर्स से रिटायर शशिकांत मिश्र ने संगम से करीब चार किमी दूर अरैल में अपनी 12 बीघा जमीन पर आठ सौ मेहमानों के लिए जर्मन तकनीक से वॉटरप्रूफ और फायरप्रूफ कॉटेजों की लंबी कतार बनाई। मौनी अमावस के सबसे महत्वपूर्ण स्नान के समय बढ़ी मांग को देखते हुए सौ लोगों को ठहराने की क्षमता बढ़ानी पड़ी। इंटरनेट, टीवी, भोजन और एसी कार के साथ डबल बेड का सुपर डीलक्स कॉटेज 18 हजार रुपए रोज। उनके यहां 70 फीसदी भारतीय आए। ज्यादातर बुकिंग ऑनलाइन हुई। 
 
कुंभ कॉटेज, कुंभ विलेज, मैत्रेयी वैदिक विलेज, प्रयाग हेरिटेज, लक्ष्मी कुटीर और महाकुंभ फेस्टीवल ने वेबसाइटों के जरिए एक साल पहले ही मार्केटिंग शुरू कर दी थी। प्रयाग हेरिटेज को पहली बुकिंग पिछले साल फरवरी में ही मिल गई थी। अमेरिका के थॉमस रॉथ की। दूसरे देशों से जब ऑनलाइन पूछताछ बढ़ी तो सबके कान खड़े हुए। अक्टूबर 2012 के बाद ही कॉटेज बनना शुरू हुए। वरिष्ठ वकील चंद्रशील द्विवेदी का कहना है कि इन कारोबारियों ने अतिथि देवो भव की परंपरा को डॉलर और पौंड में ऑनलाइन कर दिया। मुंह मांगे दामों पर सुविधाओं की मांग ने पुरोहितों पर भी दबाव बढ़ाया। कुछ ने परंपरागत सस्ते टेंटों की बजाए सुविधा-संपन्न कॉटेज बनाए। तीर्थ पुरोहित राहुल शर्मा ने बताया कि उन्होंने तीन सौ अतिथियों के लिए इंतजाम किए। डबल बेड का स्विस कॉटेज छह हजार रुपए में। 10-12 सदस्यों के लिए फैमिली कॉटेज 40 हजार रुपए में। पुरोहित होने के नाते उन्होंने परंपराओं का भी ध्यान रखा। इसलिए इंटरनेट और टीवी नहीं लगाए। उनके यहां 80 फीसदी भारतीय हैं। 
 
वे कहते हैं कि हजारों सालों से कुंभ में आकर त्याग और तप का ही महत्व रहा है। लेकिन इस कुंभ का यह नया रूप है कि श्रद्धालु घर से बेहतर सुविधाओं की मांग यहां कर रहे हैं। उनके पास पैसा है। इसलिए उन्हें यहां भी सब कुछ आरामदेह ही चाहिए। कोलकाता के राजन केडिया को ही लीजिए। दो दिन के लिए उन्होंने एक कॉटेेज बुक कराया। ट्रेवल एजेंट को उनकी खास हिदायतें थीं-वाईफाई, वेस्टर्न टायलेट और गाइड के रूप में एक जानकार पंडित पूरे समय चाहिए। दूरी संगम से तीन किमी से ज्यादा न हो। बमुश्किल उन्हें एक कॉटेज पसंद आया। केडिया कहते हैं कि सुविधाएं होने से हम कम वक्त में ज्यादा एंजॉय कर सकते हैं। इसमें क्या हर्ज है?
 
इस कारोबारी मुकाबले में साधु-महात्मा सबसे आगे हैं। 20-20 बीघा जमीन पर फैले कुछ संतों के पांडाल भी अतिथि सत्कार के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं। दिलचस्प यह कि उन्हें सरकार ने मुफ्त जमीनें दी हैं और 12 सौ करोड़ रुपए बुनियादी सुविधाओं पर खर्च किए। मगर कॉटेज के चार्ज पांच से 15 हजार रुपए रोज हैं। वे यह राशि कीमत के तौर पर नहीं सहयोग राशि के रूप में ही सहर्ष स्वीकार करते है। महर्षि महेश योगी की संस्थाओं, गंगा सेवा समिति और कुछ पंचायती अखाड़ों ने अपने यहां लक्जरी कॉटेज निजी क्षेत्र के होटल प्रबंधकों से ही बनवाए। कड़ी सुरक्षा वाले पायलट बाबा के आश्रम में विदेशी पर्यटकों के लिए माहौल का विशेष महत्व है। जैसे एक ही मुल्क से आने वालों के लिए एक ही बड़ा कॉटेज मिल जाए। स्वामी अवधेशानंदगिरि के अनुयायियों को महाराजजी की कथा सुनने का सुअवसर मायने रखता है। कुंभ में पैसे-धेले की ऐसी तुच्छ बातों का क्या महत्व? 
 
धार्मिक उद्देश्य के लिए मुफ्त मिली जमीनों पर कारोबार जारी है मगर संत समुदाय के खिलाफ कार्रवाई आसान नहीं। उलटे आला अफसर भी उनके दरबार में रोज जाकर आशीर्वाद लेते हैं ताकि फीडबैक सरकार के पास अच्छा जाए। अपर मेला अधिकारी जितेंद्र कुमार कहते हैं, ‘सरकार ने जमीनें सिर्फ 55 दिन के लिए आवंटित की हैं। अगर कुछ संस्थाएं इनका इस्तेमाल आर्थिक फायदे के लिए कर रही हैं तो यह उनके सोचने का विषय है।’ 
 
मार्केटिंग का सबसे बड़ा मंच 
 
कुंभ मार्केटिंग का भी सबसे बड़ा मंच है। ब्रज से करीब पांच सौ रामलीला और रासलीला मंडलियों के हजारों कलाकार यहां आए हैं। हर मंडली यहां से करीब डेढ़ लाख रुपए कमाकर लौटेगी। साथ में मिलेंगे साल भर के कार्यक्रम। वृंदावन के आदर्श रामलीला मंडल के संचालक पूरनलाल के ग्रुप में 14 कलाकार हैं। रायबरेली और हजारी बाग से आए तीर्थयात्रियों को उनकी प्रस्तुति इतनी पसंद आई कि अगले दो महीने वे वहीं व्यस्त रहने वाले हैं। 
 
संतों की संस्थाओं के आमंत्रण पर वैदिक परंपरा के 108 यज्ञों के लिए 50 हजार दक्ष आचार्य भी यहां आए। जैसे शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के यहां पांच सौ वैदिक आचार्य हैं। योग्यता और अनुभव के हिसाब से हर आचार्य के हिस्से में बतौर दक्षिणा आएंगे औसत 50 हजार रुपए। कोने-कोने में भागवत और रामायण के प्रवचन गूंज रहे हैं। देश भर से एक हजार से ज्यादा प्रवचनकार अपनी संगीत मंडलियों के साथ डेरा डाले हुए हैं। फरीदाबाद से आए पं. कैलाश शास्त्री सीकर के दाऊधाम खालसा परिसर में पांच कथाएं करेंगे। एक लाख रुपए की एकमुश्त आमदनी के अलावा मिलने वाली फुटकर दक्षिणा भी उनकी होगी। लेकिन इससे ज्यादा अहम यह है कि उन्हें देश भर में कथाओं का मौका मिल रहा है। 
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