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देश में चार जगहों पर क्यों लगता है कुंभ मेला, जानिए बस एक क्लिक पर
धर्म डेस्क. उज्जैन
| Jan 05, 2013, 13:29PM IST

देश में चार शहरों में कुंभ मेलों का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन। इन चार शहरों में 12 साल में एक बार कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। कुंभ मेले की परंपरा पौराणिक मानी गई है। इसके पीछे पुराणों में कई कथाएं मौजूद हैं। इन सब कथाओं में समुद्र मंथन की कथा भी है।
विष्णु पुराण, श्रीमद् भागवत, महाभारत सहित कई पुराणों में कथा आती है कि ऋषियों के शाप के कारण जब इंद्र और अन्य देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया। तब सभी देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास गए और उनसे सहायता मांगी। दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य के पास मृत संजीवनी नाम की विद्या थी, जिससे वे युद्ध में मारे गए राक्षसों को फिर से जीवित कर देते थे, लेकिन देवताओं के पास ऐसी कोई शक्ति नहीं थी। भगवान विष्णु ने उन्हें सुझाव दिया कि अगर किसी तरह अमरत्व पा लिया जाए तो फिर राक्षसों से आसानी से युद्ध किया जा सकता है।
तब भगवान विष्णु ने उन्हें दैत्यों के साथ मिलकर क्षीरसागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। देवतागण दैत्यों के साथ संधि करके अमृत निकालने लग गए। मदरांचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर समुद्र को मथा गया। इसमें से कालकूट विष सहित 14 रत्न निकले। अंत में भगवान धनवंतरि अमृत का घड़ा लेकर निकले। अमृत कुंभ के निकलते ही देवताओं और दैत्यों में इसे पाने के लिए होड़ मच गई। धनवंतरि उसे लेकर आकाश में उड़ने लगे। देवता और दानव उनके पीछे लग गए।
इस भागमभाग में पृथ्वी के 4 स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूंदें गिरी थीं। लड़ाई शांत करने के लिए भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर यथाधिकार सबको अमृत बांटकर पिला दिया। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया।
अमृत गिरने से ये चार स्थान परम मोक्ष प्राप्त करने के सबसे पवित्र तीर्थ बन गए। अमृत की बूंदें इन स्थानों पर मौजूद नदियों में गिरी थीं, सो यहां स्नान करने की परंपरा बन गई।





