कैसे और किसने बनाए नागा साधुओं के दशनामी अखाड़े?

हिंदू धर्म में साधु-संतों का स्थान बहुत ऊंचा माना गया है। शैव संन्यासियों और नागा साधुओं के लिए लोगों में बहुत आस्था रही है। हमारे धर्म में साधु समाज का इतिहास बहुत रोचक रहा है। नागा साधुओं को सिर्फ साधु नहीं, योद्धा माना गया है। वे धर्म की रक्षा के लिए लड़ने वाले योद्धा हैं। वर्तमान में प्रमुख रूप से 13 अखाड़े हैं। इनमें से 10 शैवों के और तीन वैष्णवों के हैं।
शैवों के दस अखाड़े हैं, जिनकी अपनी परंपराएं और मान्यताएं हैं। शैव अखाड़ों की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। जब देश में वैदिक सनातन हिंदू धर्म पर बौद्ध धर्म हावी हो रहा था, विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण शुरू हो गए थे, तब आदि शंकराचार्य ने चार मठों - श्रृंगेरी मठ, ज्योतिर्मठ, शारदा मठ और गोवर्धन मठ की स्थापना की। इन चार मठों में चार शंकराचार्य होते हैं, जो दशनामी अखाड़ों का संचालन करते हैं।
इन दशनामी अखाड़ों का पहला उल्लेख अखंड आवाहन अखाड़े के रुप में 547ई. में मिलता है। इसका केंद्र काशी था। प्रमुख दस शैव अखाड़े श्री पंचायती दशनामी जूना अखाड़ा, श्री पंचायती तपोनिधि निरंजनी अखाड़ा, श्री पंचायती आवाहन अखाड़ा, श्री पंचायती आनंद अखाड़ा, श्री पंचायती अग्नि अखाड़ा, श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा. श्री पंचायती अटल अखाड़ा, श्री पंचायती बड़ा अदासीन अखाड़ा, श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा और श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा हैं।
इनमें से उदासीन अखाड़े की स्थापना गुरु नानक देव के पुत्र श्रीचंद भगवान ने की थी। ये बाद में दो हो गए - बड़ा उदासीन और नया उदासीन। श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा भी सिख समाज से जुड़ा है।
वैष्णव अखाड़े
इसी तरह वैष्णव अखाड़े भी हैं। इनमें तीन अखाड़े मुख्य हैं। श्री निर्वाणी अखाड़ा, श्री निर्मोही अखाड़ा और श्री दिगंबर अखाड़ा। इन तीन अखाड़ों की कई छोटी-छोटी शाखाएं हैं। ये मूलतः राम भक्ति मार्गी और कृष्ण भक्ति मार्गी होते हैं।









