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रेप की आरोप लगाने वाली साध्वी चिदार्पिता की कहानी, उन्हीं की जुबानी

Bhaskar.com | Aug 11, 2012, 15:53PM IST
 
 


बदायूं. पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद पर रेप का आरोप लगाने वाली चिदर्पिता अब फिर से साध्‍वी बन सकती हैं। चिदर्पिता का आरोप है कि उनके पति बीपी गौतम उनके साथ मारपीट करते हैं और उनकी गृहस्‍थी तबाह हो गई है। चिदर्पिता के मुताबिक उनके पास स्वामी जी (चिन्मयानंद) का फोन आया था और उन्होंने कहा, ' तुम जिस हाल में हो चली आओ, तुम्हारे लिए आश्रम के दरवाजे हमेशा खुले हैं।' चिदर्पिता का कहना है कि वह अभी असमंजस में हैं लेकिन इस नरक भरी जिंदगी से तो वे अच्छे हैं, जिन्होंने बुरे वक्त पर साथ दिया।

 

स्वामी की पूर्व शिष्या फेसबुक पर साध्वी चिदार्पिता के रूप में पहचानी जाती हैं। उनके ढेर सारे दोस्त और फैन हैं। कुछ दिनों पहले उन्होंने शादी की तो उनका दूसरा रूप सामने आया। अचानक से उनकी दुनिया बदल गई और बात यहां तक आ पहुंची। फेसबुक की वाल पर उन्होंने लिखा -

 

''बचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थी। मां के साथ लगभग हर शाम मंदिर जाती थी। इसी बीच मां की सहेली ने हरिद्वार में भागवत कथा का आयोजन किया और मुझे वहां मां के साथ जाने का अवसर मिला। उसी समय स्वामी चिन्मयानंद सरस्वती से परिचय हुआ। वे उस समय जौनपुर से सांसद थे। मेरी उम्र लगभग बीस वर्ष थी। वे मुझे सन्यास के लिए मानसिक रूप से तैयार करने लगे।

 

एक समय आया, जब लगा कि अब मैं सन्यास के लिए मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार हूं। तब मैंने स्वामी जी से सन्यास के लिए कहा। उन्होंने कहा, पहले दीक्षा होगी, उसके कुछ समय बाद सन्यास। 2002 में मेरी दीक्षा हुई और मुझे नाम दिया गया- साध्वी चिदर्पिता। स्वामी जी ने आदेश दिया कि तुम शाहजहांपुर स्थित मुमुक्ष आश्रम में रहो।

 

इस बीच कई बार मैंने स्वामी जी से सन्यास की चर्चा की। उन्होंने हर बार उसे अगले साल पर टाल दिया। इसी दौरान मैं गौतम के संपर्क में आई। उस समय उन्होंने प्रकट नहीं किया पर उनके हृदय में मेरे प्रति प्रेम था। उन्होंने बिना किसी संकोच के कहा, आप चुनाव लडि़ए। मैंने जब यह बात स्वामीजी से कही तो वह मेरा उत्साह बढ़ाने के बजाए मुझ पर बरस पड़े। उनके उस रूप को देखकर मैं स्तब्ध थी।

 

उस समय हमारी जो बात हुई, उसका निचोड़ यह निकला कि उन्होंने कभी मेरे लिए कुछ सोचा ही नहीं। उनकी यही अपेक्षा थी कि मैं गृहिणी न होकर भी गृहिणी की तरह आश्रम की देखभाल करूं। फिर मैं आश्रम छोड़कर आ गई। शून्य से जीवन शुरू करना था पर कोई चिंता नहीं थी। एक मजबूत कंधा मेरे साथ था। श्राद्ध पक्ष खत्म होने तक मैं गौतम जी के परिवार के साथ रही। वहां मुझे भरपूर स्नेह मिला। नवरात्र शुरू होते ही हमने विवाह कर लिया। मैने इस विवाह को ईश्वरीय आदेश माना है।''

 
 
 

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