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ग्राउंड रिपोर्ट : मुख्यमंत्री कोई हो, हरिशंकर तिवारी होते हैं मंत्री

 
Source: शरद गुप्ता   |   Last Updated 10:13(04/02/12)
 
 
 
 
चिल्लूपार। गोरखपुर, मऊ और बलिया जिलों की सीमा। राप्ती और घाघरा नदियों के बीच का इलाका। हर साल बाढ़ का शिकार। कई बार आठ-दस फीट पानी के नीचे। हर बार एक नई त्रासदी। बाढ़ त्रासदी जैसी ही एक और चीज निरंतर। हरिशंकर तिवारी।

तिवारी हर उस बात का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसके लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति जानी जाती है। अच्छी भी खराब भी। पिछली बार छोड़कर 1985 से हर बार जीते। हर बार अलग चुनाव चिन्ह। इस बार चुनाव निशान कप-प्लेट है। इससे पहले 2007 में हवाई जहाज था। 2002 में कुर्सी। 1996 में पुष्प अर्पित करती हुई महिला। पिछले पंद्रह सालों के दौरान प्रदेश की तकरीबन हर सरकार में मंत्री रहे। केवल पिछली बार छोड़कर। उनका बड़ा बेटा भीष्म शंकर तिवारी उर्फ कुशल तिवारी बसपा सांसद हो गया। भांजा गणेश शंकर पांडे बसपा से विधान परिषद सभापति है। छोटा बेटा विनय शंकर तिवारी बसपा के टिकट पर बांसी से चुनाव लड़ रहा है। तिवारी निर्दलीय ही मैदान में डटे हैं। अगर जीते तो फिर मंत्री?

उत्तरप्रदेश की राजनीति में निर्दलीय विधायक का यही महत्व है।76 साल के तिवारी किसी गंवई बुजुर्ग की तरह लगते हैं। दादाजी। धोती-कुर्ता और सदरी। सर पर ऊनी टोपी। बोलते क्या हैं मिमियाते से लगते हैं। नाक से जो बोलते हैं। लेकिन पुलिस के रिकॉर्ड में वे लंबे समय तक हिस्ट्रीशीटर माफिया रहे हैं। दादाजी नहीं सिर्फ दादा। आतंक का पर्याय। छात्र जीवन में गोरखपुर के बीचोबीच एक किराए के कमरे में रहते थे। आज वह कमरा फैलकर कई एकड़ जमीन घेर चुका है।

बरसों से पूर्वाचल में दिया जाना वाला हर ठेका या तो तिवारीजी को खुद या उनके आदमी को ही मिलता है। तब वे निजी सुरक्षा गार्डो की सुरक्षा में रहते थे। आज पुलिस के जवान उनकी सुरक्षा करते हैं। अब उन्हें किसी भी विरोधी माफिया से खतरा नहीं है। कोई जिन्दा ही जो नहीं बचा। गोरखपुर से साठ किलामीटर दूर है बड़हलगंज कस्बा। सड़क की हालत ऐसी कि तीन घंटे से ज्यादा समय लगता है पहुंचने में। 25 किलोमीटर दूर बिहार सीमा पर छपिया गांव के दालान में तीन चमचमाती एसयूवी रुकती हैं। तिवारी चारपाइयों की ओर बढ़ते हैं। दो कदम चलते ही पैर छूने वालों की लाइन लगी है। यह दृश्य गोरखनाथ मंदिर के महंत योगी आदित्यनाथ के भक्तों की याद दिलाता है। दोनों में कट्टर दुश्मनी है। एक ब्राह्मण नेता तो दूसरा राजपूत क्षत्रियों का। अखिल भारतीय ब्राह्मण सभा के महामंत्री रहे तिवारी के हर विरोधी को गोरखनाथ मठ में शरण मिलती रही है। गांव में तिवारी चाय पीते हैं। काजू, बादाम और किशमिश भी पेश होती है। यह संपन्न ब्राह्मणों का गांव है। उनके साथी सभी मौजूद लोगों को उनकी फोटो और चुनाव निशान - कप प्लेट - वाला एक-एक खूबसूरत कैलेंडर बांटते हैं। बिल्ले, पोस्टर और स्टीकर भी। तिवारी कोई भाषण नहीं देते। न ही वोट देने की कोई अपील। केवल चाय पीकर गाड़ी में बैठ जाते हैं। एक बार फिर पैर छूने का सिलसिला। इस बार भीड़ में कुछ हरिजन भी है।

बताते हैं कि उनकी जमीन पर स्थानीय बसपा विधासक राजेश त्रिपाठी ने कब्जा कर लिया। तिवारी ने संवाददाता को बुलाया। कहा- जब तक मैं विधायक था किसी की हिम्मत नहीं हुई। अब बसपा विधायक ही दलितों की जमीन पर कब्जा कर रहा है। समर्थक बताते हैं -पिछली बार कन्फ्यूजन हो गया था। एक और हरिशंकर निर्दलीय था। उसका निशान पतंग। उसे 5500 वोट मिले जबकि कांग्रेस को 1200 वोट। लोग हरिशंकर नाम देखकर उसे वोट दे आए। तिवारी 4000 वोट से हार गए। भाजपा ने अपने वोट बसपा को डलवा दिए। जब पूरा परिवार बसपा में है तो वे निर्दलीय कैसे? तिवारी मुस्कुराते हैं - ‘मैंने मांगा ही नहीं। रही छवि की बात तो आप खुद ही देखिए कि मैं लोगों को वोट देने के लिए कैसे धमकाता हूं। मैं 50 साल से यहीं हूं। हर दुख-सुख में साथ। बाढ़ में। पानी में। सरकार नहीं आती, मैं आता हूं। कभी नाव से तो कभी साइकिल से।’ गांव वाले तुरंत तस्दीक करते हैं।

तिवारी ज्यों गाड़ी में बैठते हैं, समर्थक नारे लगाने लगते हैं। जय-जयकार। धूल उड़ाती गाड़ियां बढ़ जाती हैं अगले मुकाम की ओर..

बनती-गिरती सरकारों में हर बार मंत्री

> 1998 कल्याण सिंह द्वारा बसपा को तोड़कर बनाई सरकार में साइंस और टेक्नोलॉजी मंत्री
> 2000 राम प्रकाश गुप्त की भाजपा सरकार में बने स्टाम्प रजिस्ट्रेशन मंत्री
> 2001 राजनाथ सिंह की भाजपा सरकार में भी मंत्री कायम
> 2002 मायावती की बसपा सरकार में भी मंत्रिमंडल के सदस्य
> 2003-07 मुलायम सिंह की सरकार में भी रहे मंत्री

> 03 बार निर्दलीय विधायक रहे। एक बार हारे
> 02 बार कांग्रेस के टिकट पर जीते
> 01 बार तिवारी कांग्रेस से भी जीते।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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