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ग्राउंड रिपोर्ट : मायावती के किले में पहली जंग आज!

 
Source: शरद गुप्ता   |   Last Updated 09:56(08/02/12)
 
 
 
 
अयोध्या। उत्तर प्रदेश में बुधवार को पहले दौर में 55 सीटों के लिए वोटिंग होगी। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में जो 22 सीटें जीतीं उनमें से पांच इसी क्षेत्र में है। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की कोई लहर नहीं थी। बल्कि केंद्र की कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के खिलाफ एंटी-इन्कमबेंसी थी। लेकिन पिछड़े कुर्मी जाति के नेता बेनी प्रसाद वर्मा के कांग्रेस में आने से फर्क पड़ा। पार्टी उन सीटों पर जीती जिन पर 1984 के बाद से कभी नहीं जीती थी। बाराबंकी, गोंडा, कैसरगंज, फैजाबाद और बस्ती।

फैजाबाद से सांसद चुने गए निर्मल खत्री कहते हैं कि उनके हिसाब से यह अंतर कुर्मी, ब्राह्मण और मुसलमानों मतदाताओं के कांग्रेस की ओर रुझान हो जाने से आया। साथ ही कभी मायावती के खास सिपहसालार रहे दलित नेता पीएल पुनिया के कारण बसपा का गढ़ माने जाने इस क्षेत्र में कांग्रेस ने सेंध लगाई। हालात यह हुए कि 2007 के विधानसभा चुनाव में इन 55 में से केवल तीन सीटें जीतने वाली कांग्रेस लोकसभा में 21 सीटों पर आगे रही।

2007 में बेनी वर्मा अयोध्या से लड़े थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी। बेटा राकेश वर्मा भी बाराबंकी से इंडियन जस्टिस पार्टी से लड़ा और हारा था। जबकि 2007 के विधानसभा चुनाव में इन 55 में से 33 सीटें बसपा के खाते में गई थीं। लेकिन दो साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में वह केवल 15 सीटों तक ही सिमट गई।

अंबेदकरनगर जिले में 1996 के बाद से बसपा एक भी विधानसभा सीट नहीं हारी। लोकसभा चुनाव में भी उसका उम्मीदवार राकेश पांडे जीता। लेकिन इस लोकसभा सीट के अंदर आने वाले पांच विधानसभा क्षेत्रों में से वह केवल दो पर ही आगे रहे जबकि तीन जगहों पर सपा का प्रत्याशी आगे रहा। चूंकि उन दो सीटों पर वे काफी बड़े अंतर से आगे थे इसलिए जीत राकेश पांडे की हुई।

अब हालात बदल गए हैं। पिछली बार की सफलता से उत्साहित कांग्रेस आलाकमान ने केंद्रीय स्टील मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा को इतना महत्व दिया कि इस क्षेत्र में इस बार अधिकतर टिकट उनके कहने से ही दिए गए। लेकिन इससे दूसरे नेता नाराज हो गए।

केंद्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पुनिया लगभग पूरे चुनाव गायब रहे। पूछने पर बोले - पार्टी ने उत्तराखंड में चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी थी।

बेनी बाबू खुद इतने अलोकप्रिय हो गए हैं कि लोग उन्हें सुनना ही नहीं चाहते। गोंडा, बहराइच आदि जगहों पर राहुल गांधी की सभा में उन्हें बोलने ही नहीं दिया गया। राहुल के यह कहने के बावजूद कि अगर आप बेनी बाबू को बोलने नहीं देंगे तो मैं भी बिना बोले चला जाऊंगा। लोगों ने कहा - आप भले ही चले जाएं, हम बेनी प्रसाद वर्मा को नहीं सुनना चाहते। मंत्री बनने के बाद वे क्षेत्र में झांकने तक न आए। इस बार राकेश वर्मा बाराबंकी में दरियाबाद सीट से फिर लड़ रहे हैं।

हिंदू अखबार के लिए लंबे समय तक काम कर चुके राजनीतिक विश्लेषक जे पी शुक्ल मानते हैं कि इस बार कुर्मियों के अलावा ब्राह्मण और मुसलमान मतदाता किसी हद तक कांग्रेस से उदासीन हो गए र्है। लेकिन इसका फायदा मायावती या भाजपा को नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी को मिल रहा है।

दांव पर बेटे

> बेनीप्रसाद वर्मा (केंद्रीय मंत्री) के बेटे राकेश दरियाबाद से कांग्रेस प्रत्याशी।
> जगदंबिका पाल (कांग्रेस सांसद) के बेटे अभिषेक बस्ती से प्रत्याशी।
> रमाकांत यादव (भाजपा सांसद) के बेटे अरुण जलालपुर सीट से प्रत्याशी।
> राकेश पांडे (बसपा सांसद) के बेटे रितेश जलालपुर से प्रत्याशी।

आपराधिक चेहरे

> मित्रसेन यादव : बीकापुर से सपा प्रत्याशी। 70 के दशक में इन्हें उम्रकैद की सजा हुई थी। और राष्ट्रपति से सजा माफी मिली। और भी कई केस दर्ज हैं।
> अभय सिंह : लखनऊ के जेलर हत्याकांड का मुख्य आरोपी गोसाईगंज से सपा के टिकट पर मैदान में। रीता बहुगुणा के घर में आग लगाने वाले जितेंद्र के भाई की पत्नी यहीं से पीस पार्टी की प्रत्याशी।

चर्चित चुनाव

> लल्लूसिंह : अयोध्या से फिर भाजपा प्रत्याशी। 91 से लगातार जीत रहे हैं। यहां कब्जे की कोशिश में सभी दल।

कसौटी पर सीट

> अयोध्या : भाजपा को किन्नर गुलशन बिंदू से कड़ी चुनौती।
> इटावा : पूर्व स्पीकर माताप्रसाद पांडे सपा प्रत्याशी।

साख की चुनौती

4 मौजूदा मंत्री, 19 पूर्व मंत्री, 31 विधायक।

सबकी नजर इस पर, कुर्मी जाएंगे किधर

32 सीटों पर कुर्मी निर्णायक

> बाराबंकी, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, गोंडा, जिलो में 50% वोटर यादव, कुर्मी समाज के।
> पिछले चुनाव में सपा से नाराज कुर्मियों ने बसपा का साथ दिया। इसलिए बसपा ने 30 सीटें जीतीं।
> इस बार कुर्मी माया और बेनी दोनों से नाराज है। उनका झुकाव एक बार फिर सपा की ओर।
> यादव पहले से उसका वोट बैंक। मुस्लिमों ने भी साथ दिया तो माया का यह गढ़ खतरे में।

आज 10 जिलों में पहले दौर की वोटिंग है। इन जिलों में कभी मुलायम का कब्जा था, जो अब माया का गढ़ है। पहले दौर की वोटिंग से तीन सवालों के जवाब मिलेंगे, क्या मुलायम अपनी जगह हासिल कर पाएंगे? क्या अयोध्या में फिर भाजपा जीतेगी? क्या कांग्रेस लोकसभा चुनाव वाला जादू दोहरा पाएगी?
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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