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स्वाइन फ्लू के मरीज बढ़े, लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह
भास्कर न्यूज | Feb 18, 2013, 03:08AM IST

नई दिल्ली . सरकार बार-बार यह दावा कर रही है कि स्वाइन फ्लू नियंत्रण में है, लेकिन दिन प्रतिदिन स्वाइन फ्लू के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस वर्ष एक दिन में सबसे अधिक स्वाइन फ्लू के 60 नए मरीज की पहचान की गई। इसके साथ इस वर्ष अब तक दिल्ली में स्वाइन फ्लू के कुल मामलों की संख्या 420 तक पहुंच गई है। हालांकि अब तक दिल्ली में 15 लोगों की जान स्वाइन फ्लू से जा चुकी है, लेकिन सरकार के आंकड़ों में इसकी संख्या कम है।
बुखार के साथ छाती में दर्द, सांस में तकलीफ और सांस उखड़ना, खून में ऑक्सीजन की कमी, रक्तचाप कम होना, गला सूखना, सिर में दर्द और बार-बार उल्टी, तनाव, डायरिया ये प्रमुख लक्षण हैं, जो स्वाइन फ्लू को सामान्य फ्लू से अलग करता है। अगर समय पर लोग इस अंतर को पहचानने में सफल होते हैं तो उनका इलाज संभव है। सच तो यह है कि 90 फीसद स्वाइन फ्लू अपने आप ठीक हो जाता है। लेकिन फिर भी इस लक्षण की पहचान जरूरी है और ऐसे लोग जो किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य दिक्कतों से परेशान हैं, उन्हें एच1एन1 वायरस और परेशान कर सकता है।
मेडिसिन के डॉक्टर अनिल बंसल का कहना है कि एच1एन1 वायरस की वजह से स्वाइन फ्लू होता है। आमतौर पर बैक्टिरिया से पीड़ित लोगों को इलाज के लिए एंटीबायोटिक्स बाजार में उपलब्ध है, लेकिन वायरस से होने वाले संक्रमण से इलाज के लिए दुनिया भर में कोई दवा उपलब्ध नहीं है। वायरस के इलाज के लिए एंटी वायरल दवा को प्रयोग किया जाता है, जो इन दिनों बाजार में टेमी फ्लू के नाम से उपलब्ध हैं। टेमी फ्लू वायरस को मार पाने में सक्षम नहीं होता, लेकिन यह वायरस के अटैक को कम करने में जरूर मददगार होता है। इसका फायदा यह है कि इससे नए वायरस सक्रिय नहीं होती है और कुछ दिन के इलाज में मरीज ठीक हो जाता है।
इन्हें है ज्यादा रिस्क
डॉक्टर ने कहा कि जब ये वायरस अटैक करता है तो मानव शरीर में मौजूद श्वेत रक्त कण, अगर मजबूत होता है तो वह वायरस के अटैक को रोकता है लेकिन अगर यह कमजोर होता है तो इसका अटैक रोक नहीं पाता। ऐसी स्थिति में लोग वायरस का शिकार हो जाता है। इससे सबसे ज्यादा दिक्कत टीबी के मरीज, एचआईवी के मरीज, एनिमिया के मरीज, बुजुर्ग, बच्चे, महिलाएं, मधुमेह से पीड़ित लोग को होती है। ऐसे लोग जब इसके चपेट में आते हैं तो उन्हें तत्काल इलाज की जरूरत महसूस होती है। नहीं तो मरीज की जान भी जा सकती है।






