बड़ी कोशिशों से ही सुधरेगा निवेश का माहौल

यूपीए सरकार की ओर से मल्टीब्रांड में एफडीआई के खिलाफ विपक्ष के मोर्चे को जीत लेने के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है अब रुके हुए आर्थिक सुधार के कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ेंगे।
इस कयास में सच्चाई हो सकती है लेकिन सभी निवेशक ऐसा नहीं सोच रहे हैं। उन्हें नहीं लगता कि सुधारों का स्वर्ण युग आने ही वाला है या फिर अगले कुछ दिनों में भारतीय अर्थव्यवस्था में सब कुछ ठीक-ठाक हो जाएगा।
हाल में रतन टाटा ने देश में निवेश माहौल के खिलाफ जो भड़ास निकाली है वह यह बताने के लिए काफी है कि सिर्फ रिटेल में ही एफडीआई की राह की अड़चनों से ग्रोथ को नुकसान नहीं पहुंच रहा है।
उन्होंने परियोजनाओं को क्लीयरेंस मिलने में होने वाली देरी की ओर इशारा किया है। टाटा जैसे निवेशक को भी इस देश में स्टील प्लांट शुरू करने के लिए सात से आठ साल का इंतजार करना पड़ता है। उन्होंने इस बात का संकेत दिया है कि उनका समूह भविष्य के ज्यादातर विस्तार विदेशी बाजारों में ही करेगा।
देश के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से एक के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की ओर से आने वाले ऐसे बयानों से होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्होंने निवेश माहौल के बारे में जो टिप्पणी कि उससे विदेशी निवेशकों में डर बैठ सकता है। उन्हें इस बात से झटका लग सकता है देश का प्रमुख उद्योगपति भविष्य की निवेश योजनाओं के लिए विदेशी बाजारों की ओर रुख करने की सोच रहा है। इसलिए यह समय सरकार को अपने गिरेबान में झांकने का है।
उसे अपनी नीतियों की समीक्षा करनी होगी और इस देश में निवेशकों की राह में आने वाली अड़चनों को दूर करना होगा।
रतन टाटा ने जिस पहली और बड़ी अड़चन की ओर इशारा किया है वह है भ्रष्टाचार। हाल के एक इंटरव्यू में उन्होंने सिंगापुर एयरलाइंस के साथ मिलकर अपनी एयरलाइंस शुरू करने की असफल कोशिश का जिक्र किया है। उनका साफ कहना था कि उन दिनों एक अनाम उद्योगपति ने उन्हें उस समय के नागरिक उड्डयन मंत्री को रिश्वत देने का निर्देश दिया था।
टाटा का यह खुलासा सरकार में उच्चस्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार का एक और उदाहरण ही है। कॉमनवेल्थ गेम्स और फिर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले से लेकर तमाम घोटालों और फिर इसके बाद महाराष्ट्र का सिंचाई घोटाला। एक के बाद एक इस तरह के कई घोटाले पिछले दिनों छाए रहे हैं। भ्रष्टाचार और घोटालों की एक ऐसी अंतहीन सूूची दिख रही है, जिसने इकोनॉमी और भारत के ग्लोबल इमेज दोनों को चोट पहुंचाई है।
घोटालों की हाई प्रोफाइल सूची भविष्य में निवेशकों को भारत से दूर कर देगी। लेकिन यहां यह जिक्र करना भी जरूरी है कि भ्रष्टाचार सिर्फ भारत की समस्या नहीं है। चीन में सरकार में बड़े पदों पर बैठे लोगों की ओर से भ्रष्टाचार के बड़े मामले सामने आए हैं। इसके बावजूद चीन बड़े निवेशकों को स्वागत करने में कामयाब रहा है और उनकी नई परियोजनाओं को रफ्तार देने में भी।
बहरहाल, भारत में भ्रष्टाचार को इस आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता कि उभरती अर्थव्यवस्था वाले सभी देशों में ऐसा हो रहा है। इसलिए यूपीए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि भ्रष्टाचार निवेश प्रक्रिया को पटरी से न उतार दे।
रतन टाटा ने एक और अहम सवाल उठाया है। यह सवाल नीतिगत फैसले के मोर्चे पर पसरी जड़ता है, जिसे 'पॉलिसी पैरालिसिसÓ का नाम दिया जा रहा है। वास्तिवकता यह है कि आज के दौर की यह सबसे मुश्किल समस्या बनती जा रही है। निवेशकों को किसी भी परियोजना के लिए सरकार के कई स्तर पर मंजूरी लेनी पड़ती है और इसमें भी काफी देर होती है। परियोजनाओं की तेज मंजूरी के लिए नेशनल इनवेस्टमेंट बोर्ड का गठन किया जाना है।
इससे परियोजनाओं को मंजूरी मिलने की रफ्तार थोड़ी बढ़ सकती है लेकिन इसके गठन में अभी देर है। लेकिन तब तक निवेशकों को परियोजनाओं से जुड़े अपने काम करवाने के लिए पहले जैसी ही भागदौड़ करनी पड़ेगी। परियोजनाओं को मंजूरी मिलने में होने वाली देरी देसी और विदेशी निवेशकों दोनों के लिए एक बड़ी बाधा बन गई है। अगर आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाना है तो जल्दी फैसले लेने के मोर्चे पर भी सुधार करना होगा।
रिटेल में एफडीआई के मामले में भी सरकार फैसले लेने में हिचकिचाएगी तो इस सेक्टर की ज्यादातर बहुराष्ट्रीय रिटेल कंपनियां बाजार के किनारे ही रहेंगी। अगर लचर नीतियां अपनाई गईं तो इन कंपनियों से जितने निवेश की उम्मीद लगाई जा रही है वह पूरी नहीं होगी।
हाल की रिपोर्टों में कहा गया है कि वालमार्ट ने भारत में अपनी लॉबिंग के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च किए। यह अपने आप में काफी दिलचस्प है। इसका मतलब यह है कि भारतीय बाजार में निवेश की तमाम अड़चनों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय रिटेल आने को बेताब हैं। समाजवादियों के इस विचार को खारिज करना चाहिए कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस देश की संपत्ति और संसाधनों को हथिया लेंगी।
इस तरह के तर्क उस समय भी दिये जाते थे जब पहली बार केंटुकी फ्राइड चिकेन जैसी फास्ट फूड चेन ने इस देश का दरवाजा खटखटाया था। उस समय बेंगुलुरू में इस चेन का पहला स्टोर खोला जाना था। लेकिन इसका जबरदस्त विरोध हुआ और रेस्तरां को असमय बंद करना पड़ा। एक तरह देखें तो यह फिजूल का विरोध था क्योंकि इसके बाद हमने हल्दीराम और बीकानेर वाला जैसे भारतीय फास्ट फूड चेन का बेहद तेज विस्तार देखा है।
वालमार्ट और टेस्को जैसी दिग्गज अंतरराष्ट्रीय रिटेल कंपनियों को भारत में प्रवेश की अनुमति देने का मतलब यह नहीं है कि वे रिलायंस, गोदरेज या कि शोर बियानी के समूह से अच्छा प्रदर्शन करेंगी। दरअसल भारतीय उद्योग इस देश के लोगों की जरूरतंों को विदेशी कंपनियों से बेहतर तरीके से समझते हैं। वे देसी लॉजिस्टिक चेन की भी बेहतर समझ रखते हैं।
विदेशी कंपनियों को भारतीय रिटेल सेक्टर में पांव जमाने में अभी लंबा वक्त लगेगा।बहरहाल, रतन टाटा का बयान बिल्कुल सही समय पर आया है और इस पर ध्यान देने की जरूरत है। अगर इस देश में निवेश का माहौल बेहतर बनाना है तो भ्रष्टाचार और 'पॉलिसी पैरालिसिस' को तुरंत खत्म करना होगा। साथ ही यह डर भी निकाल देना होगा कि कोई ईस्ट इंडिया कंपनी हमें फिर से गुलाम बना लेगी।
सुषमा रामचंद्रन
लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं। निवेश की राह में भ्रष्टाचार को खत्म करने पर जोर देता उनका लेख






