
मोहन को दिन भर की दिहाड़ी डेढ़ सौ रुपए मिलती है
लखनऊ से तक़रीबन 80 किलोमीटर दूर स्थित सीतापुर ज़िले के चुनावी माहौल का जायज़ा लेने जाते समय मुझे लगातार महसूस हो रहा था कि चुनाव की पहचान रही वो चमक-दमक वो शोर-शराबा सब लगभग ग़ायब हैं.
तभी एक रिक्शे वाला दिखा जिसके रिक्शे पर कोई व्यक्ति नहीं बैठा था बल्कि सिर्फ़ लाउडस्पीकर लगा था और दोनों तरफ़ समाजवादी पार्टी के झंडे लगे थे. यानी वो अपनी धुन में रिक्शा चलाता जा रहा था और सपा का रिकॉर्डेड संदेश बजता चला जा रहा था.
जब उससे बात की तो पता चला - नाम है मोहन और रिक्शा अपना तो है नहीं, इसलिए एजेंसी के मालिक ने रिक्शे पर मशीन रखवा दी है और कहा है कि सुबह आठ से शाम पाँच बजे तक शहर में घूमते रहो.
मोहन का कहना है कि मूर्तियों को ढकने का चुनाव आयोग का फ़ैसला बिल्कुल ग़लत है
ये रिक्शा इस समय से आगे पीछे इसलिए नहीं चलता क्योंकि चुनाव आयोग के चाबुक का डर है. दिहाड़ी है दिन भर का 150 रुपया.
मोहन का कहना है, "जब सवारी के साथ रिक्शा चलाते थे तो दिन भर में तक़रीबन 200 रुपए अपने लिए बना ही लेते थे मगर इस चुनावी माहौल में मालिक के आदेश के चलते रोज़ का 50 रुपए का नुक़सान उठाकर समाजवादी पार्टी के प्रचार वाला संदेश चला रहे हैं."
और कुरेदा तो बताया कि ख़ुद बहुजन समाज पार्टी के समर्थक हैं, मतदाता हैं मगर रोज़ी-रोटी के लिए सपा के प्रचार का रिक्शा चला रहे हैं.
मोहन कहते हैं कि ग़रीब आदमी ज़्यादा बोल नहीं रहा है मगर जब वोट देना होगा तो बसपा को ही देगा.
मगर मैने पूछा कि वो सिर्फ़ ग़रीब नहीं बल्कि ग़रीब दलित भी हैं जो कभी कांग्रेस के वोटर थे.
मोहन का कहना था कि उसके बाद वे मायावती समर्थक हो गए और वो भी कट्टर समर्थक जो लखनऊ में आंबेडकर पार्क या मायावती और कांशीराम की बड़ी-बड़ी मूर्तियों में पैसा लगाने को बिल्कुल ग़लत नहीं मानते.
उन्होंने वो पार्क कभी देखा तो नहीं है मगर उनका कहना है कि मूर्तियों को ढकने का चुनाव आयोग का फ़ैसला बिल्कुल ग़लत है.
वह कहते हैं कि आंबेडकर आवास योजना के तहत लोगों को घर मिले हैं, राशन कार्ड मिले हैं और महीने में कुछ पैसा भी मिल जाता है. इसलिए वे चाहते हैं कि बसपा की ही सरकार फिर से आए.
वे कहते हैं, “हमें जहाँ खाने को मिलेगा हम तो वहीं वोट देंगे. साइकिल वाले (सपा के संदर्भ में) कहेंगे कि हमें वोट दे दो तो क्या हम दे देंगे, हम तो नहीं देंगे क्योंकि हमें खाना खाने को तो इस सरकार में मिला है.”
चुनाव आयोग की सख्ती की वजह विधानसभा चुनावों में करोड़ों रुपए ज़ब्त भी किए गए हैं
मोहन ने बताया कि वह दसवीं फ़ेल हैं मगर फिर भी आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि उन्होंने मतदान में भाग न लिया हो. वह कभी ये नहीं सोचते कि सरकारें हमारे लिए क्या करती हैं.
वह कहते हैं, “एक-एक वोट लाखों रुपए का होता है, वोट ख़राब नहीं करना चाहिए. चाहे किसी को भी वोट दो मगर जाओ ज़रूर.”
उनकी बातें सुनकर ध्यान आया कि चुनाव आयोग लाखों रुपए ख़र्च करके हर प्रदेश में लोगों को मतदान के लिए बाहर निकलने के लिए कह रहा है.
उसने चुनाव जल्दी कराए जिससे मतदान के समय ज़्यादा गर्मी न हो मगर एयरकंडीशन्ड रूम में बैठा मतदाता इन बातों से कितना सहमत होगा ये कहना मुश्किल है.
मोहन को देखकर और वोट देने के लिए उनके जज़्बे को देखकर लगा कि जिसे सरकारों से सहूलियतें मिल रही हैं, जो ज़िदग़ी में बेहतर स्थिति में है वो मतदान के लिए भले उदासीन हो रहा हो मगर ग़रीब को अब भी अपने वोट पर भरोसा है और उसी भरोसे के सहारे वो एक बार फिर उत्तर प्रदेश चुनाव में अपनी आवाज़ उठाने बड़ी तादाद में निकलने की तैयारी में है.
कहीं भले ही लोकतंत्र एसी कमरों में सो गया हो मगर कई जगह अब भी धूप में घंटों खड़े रहने को तैयार लोकतंत्र भी इसी देश में है.