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बेटी, यह धर्म है पाप नहीं, कुंवारी कन्या बाप का मुंह देखती रह गई!

Nand Lal Sharma | Jan 04, 2013, 17:09PM IST

जयपुर. राजस्थानी धोरों के आगोश में हजारों प्रेम कहानियां खामोश छिटकीं पड़ी हैं। हवा के सर्द झोंके जब धोरों में सिहरन पैदा करते हैं तो फिजां में प्रेम आख्यान गूंजने लगते हैं। ऐसे ही प्रेम आख्यानों में से एक है जेठवा उजली की प्रेम कहानी, जब प्रेम में समर्पण की बात आती है लोगों की जुबां पर उजली का नाम होता हैं। राजस्थान के प्रसिद्ध साहित्यिक हस्तियों में से एक लक्ष्मीकुमारी चूड़ावत ने जेठवा उजली के प्रेम पर आधारित कहानी भी रची हैं। www.dainikbhaskar.com पर आज पढि़ए..जेठवा-उजली के उस अमर प्रेम की दास्तान..जहां समर्पण ही सबकुछ है...


एक दिन बरड़े की पहाडिय़ों में जबर्दस्त आंधी, तूफान के साथ मूसलाधार बारिश हुई। बरसात ऐसी कि इस तलहटी में अपने पशु चराने आए चारणों के परिवारों के बच्चे सहम गये और अपनी मांओं की छातियों से चिपक गए। बूढ़ों को लगा जैसे आज ही काल आ गया। क्या औरत, क्या आदमी और क्या बच्चे सब ईश्‍वर से प्रार्थना करने लगे कि प्रभु अपनी इस प्रकोपी बरसात को वापस ले लो। एक कामचलाउ झोंपड़ी में अस्सी बरस का बूढ़ा अमरा चारण अपनी गुदड़ी में दुबका, ठिठुरता हुआ माला के मनके फर रहा था।


आधी रात का वक्त इस भयानक बारिश में कब आ गया पता ही न चला। ऐसे ही वक्त अमरा को झोंपड़ी के बाहर घोड़े की टापों की आवाज सुनाई दी। थोड़ी देर में आवाज झोंपड़ी के बाहर आकर रूक गई। घोड़े की हिनहिनाहट सुनाई दी। बूढ़े अमरा ने अपनी जवान बेटी को आवाज दी, बेटी उजली! उठकर जरा बाहर तो देख, इस तूफानी रात में कौन आया है।


आगे पढ़िए..बूढ़े अमरा के दरवाजे पर...घोड़े के टापों की आवाज  किसे लेकर आई थी...


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