Home » Union Territory » Chandigarh » News » अजमेर की लड़ाकू को चंडीगढ़ में सम्मान रविवार को यूटी गेस्ट हाउस में महिलाओं के अधिकारों के लिए लड

अजमेर की लड़ाकू को चंडीगढ़ में सम्मान रविवार को यूटी गेस्ट हाउस में महिलाओं के अधिकारों के लिए लडऩे वालीं आशा मनवानी को मिलेगा नीरजा भनोट

aarati agnihotri | Dec 15, 2012, 19:12PM IST

चंडीगढ़।अजमेर में लोग इन्हें लड़ाकू के नाम से जानते हैं। हो भी क्यों न। पत्नी को सताने वाले हर पति को यह थप्पड़ मारने से कभी भी नहीं कतरातीं। जरूरत पड़े तो पुलिस की तरह भी पेश आती हैं। यह हैं अजमेर की 55 वर्षीय आशा मनवानी।  शनिवार को शहर पहुंचीं आशा ने सिटी लाइफ से शेयर किया लड़ाकू बनने का सफर।

किसी ने सच ही कहा कि हालात इंसान को मजबूत बना देते हैं। आशा के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह मजबूत बनीं। खुद के लिए भी और अपने जैसी दूसरी औरतों के लिए भी। इसके पीछे उनकी जिंदगी की दर्दनाक दास्तान है। आशा ने बताया कि छोटे कद के कारण उनके पति ने उन्हें शादी के बाद से कोसना शुरु किया। उन्हें अलसर की बीमारी हुईं तो उन्हें ईलाज के लिए माइके जाने को कहा और पीछे से दूसरी शादी कर ली। इस लाचार बेटी का साथ माइके वालों ने भी दिया। पर आशा ने हार नहीं मानी और हालातों के साथ लड़ती चली गईं। एक फैक्ट्री में काम मिला तो खुद का और बच्चों का गुजारा किया।

हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था, हमारी कशती वहां डूबी जहां पानी कम था। यह कहावत बोलने के बाद आशा ने दो किस्से सुनाए। जिन्हें सुनकर किसी की आंख में भी आंसू आ जाएं। आशा ने बताया कि फैमिली कोर्ट के आदेश के बावजूद उनके व्यापारी पति ने मुआवजा नहीं दिया। फैंसला हुआ भी तो मुआवजे के रूप में उन्हें महीने के मात्र 1000 रुपये मिलते थे जो बढ़कर अब 2200 हो गए हैं। यह राशी भी उन्हें कोर्ट के कई चक्कर लगाने के बाद मिलती हैं। अपनी 32 साल की बेटी की शादी के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। दहेज न देना भी बेटी की शादी न होने का कारण है। इसपर आशा ने कहा कि बुजुर्गों और रीति-रिवाजों के नाम पर आज भी लड़की के पेरेंट्स से ससुराल वाले बहुत कुछ वसूलते हैं। इसलिए बेटी की शादी में पेरेंट्स को सिर्फ बेटी के नाम की एफडी, गोल्ड और प्लॉट देना चाहिए ताकि जरूरत के समय पर वह किसी की मोहताज न हों। दूसरा किस्सा सुनाते हुए आशा ने कहा कि पाई-पाई जोड़कर जो मकान बनाया, उसकी रजिस्ट्री भी भाईयों ने धोखे से अपने नाम करा ली। मगर अवॉर्ड में मिलने वाले डेढ़ लाख रुपये पाकर वह बेहद खुश हैं।

सब कानून मालूम हैं

मनवानी 6वीं क्लास तक पढ़ी हैं मगर अब सभी कानूनी कार्यवाईयों से भली भांति अवगत हो चुकी हंै । वह असहाय महिलाओं की मदद करती हैं। महिलाओं को स्त्रिधन, कोर्ट के बाहर परिवारों को मिलाने, महिलाओं को तलाक ओर महिलाओं व उनके बच्चों को आश्रय दिलाने में मदद की है । फैमली कोर्ट अब कई मामलों में उनकी मदद लेता है। आशा महिलाओं के अधिकारों के लिए लडऩे वाली लक्ष्ता महिला संस्थान की सचिव हैं।



क्या है नीरजा भनोट अवॉर्ड

नीरजा भनोट अवॉर्ड हर साल नीरजा भनोट की याद में दिया जाता है । नीरजा भनोट साल 1986 में कराची एयरपोर्ट में हाईजैक हुये पैनएम ऐयरप्लान के दौरान यात्रियों की जान बचाते हुए शहीद हो गई थी । नीरजा बहादुरी के क्षेत्र में देश के सर्वोच्च सिविलयन अवार्ड अशोक चक्र की सबसे युवा धारक है । नीरजा भनोट अवार्ड धारक होने के लिये भारतीय महिला होना आवश्यक है जिसने सामाजिक अन्याय जैसे दहेज व अन्य उत्पाडिन को सहा हुआ है और उन मुश्किलों का सामना कर ऐसी ही पीडित अन्य महिलाओं की मदद कर समाज के लिये उदाहरण बनी हो । इसमें डेढ लाख रुपये, एक ट्राफी और प्रशंसा पत्र दिया जायेगा ।

  
KHUL KE BOL(Share your Views)
 
विज्ञापन

बड़ी खबरें

रोचक खबरें

विज्ञापन

बॉलीवुड

जीवन मंत्र

स्पोर्ट्स

जोक्स

पसंदीदा खबरें

फोटो फीचर

Email Print Comment