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पूर्व पुलिस अधिकारियों ने उठाए दिल्ली पुलिस के तरीके पर सवाल

Matrix News | Dec 27, 2012, 06:00AM IST
 कहा, सोशल मीडिया के दौर में अंग्रेजों के जमाने का भीड़ मैनेजमेंट नहीं चल सकता
संतोष ठाकुर-!- नई दिल्ली
दिल्ली में हाल के दौर में तीन आंदोलनों ने पुलिस की भीड़ प्रबंधन क्षमता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सवाल पूछा जाने लगा है कि ऐसे समय में जब लोग सिर्फ राजनीतिक दलों के आह्वान पर ही नहीं, भावनाओं के उद्वेलन से स्वत::स्फूर्त बड़ी संख्या में जुटने लगे हैं, तो क्या पुलिस को पुराने जमाने के बल प्रयोग के एकमात्र विकल्प पर ही चलना चाहिए। पुलिस के सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी भी भीड़ नियंत्रण ट्रेनिंग में बदलाव की वकालत कर रहे हैं। उनका कहना है कि बदलते समय के साथ बदलाव जरूरी है। नियमित ट्रेनिंग के साथ ही यह देखना जरूरी होगा कि भीड़ नियंत्रण में उन पुलिसवालों को ही तैनात किया जाए, जो पूरी तरह फिट हों। हालांकि ट्रेनिंग में बदलाव पर केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कहा कि पुलिस बलों की प्रक्रिया में बदलाव समय के साथ होते रहते हैं लेकिन अगर किसी तरह के व्यापक बदलाव की जरूरत है तो इस पर विचार होना चाहिए।
पुलिस सुधार पर लगभग बेहद संजीदगी से बहस को आगे बढाने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक और पूर्व बीएसएफ महानिदेशक प्रकाश सिंह ने कहा कि हर सप्ताह दंगा नियंत्रण का अभ्यास जरूरी किया जाना चाहिए। उनके समय में यह नियमित होता था। सिंह पूछते हैं कि दिल्ली में बाबा रामदेव के आंदोलन के दौरान रामलीला मैदान में रात में क्यों कार्रवाई की गई। बलपूर्वक किसी जमावड़े को हटाने की नियमावली है। रामलीला मैदान में रात में लोग सो रहे थे। वे कानून के लिए कैसे चुनौती थे। इसी तरह उनका सवाल है कि राजपथ-इंडिया गेट पर छात्रों-युवाओं को जबरन क्यों हटाया गया। आखिर यह आदेश किसने दिया। यह सामने तो आना चाहिए। पुलिस को चाहिए कि ऐसे समय में जब सोशल साइट्स, एसएमएस से आम लोग किसी आंदोलन में भागीदार बन रहे हैं तो उनके जमावड़े को हटाने के लिए नई तरह की ट्रेनिंग पर विचार किया जाए। कितना बल और कब प्रयोग करना है, यह नए सिरे से देखना होगा। भीड़ हटाने का निर्णय ब्यूरोक्रेसी को नहीं, बल्कि पुलिस को लेना चाहिए। बदलते समय को ध्यान में रखकर भीड़ मैनेजमेंट ट्रेनिंग में बदलाव पर सोचना होगा।
बीएसएफ के पूर्व महानिदेशक और दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर अजय राज शर्मा ने भी कहा कि सोशल साइट्स, एसएमएस और कॉमन कॉज के लिए आम लोगों के बिना किसी नेता के किसी स्थान पर जुटने के दौर में बलप्रयोग पर नए सिरे से विचार की जरूरत है। भीड़ मैनेजमेंट ट्रेनिंग में नए विकल्प तलाशने चाहिए। जवानों-अधिकारियों की फिटनेस पर ध्यान दिया जाना चाहिए और ऐसे लोगों को ही ऐसी ड्यूटी में तैनात किया जाए, जो पूर्णत: फिट हों। शर्मा ने कहा कि यह समझना जरूरी है कि लाठी कब तक चलाई जाए। अगर दस लाठियां मारने से भीड़ हट रही है तो दौड़ा कर पीटना पूरी तरह अनुचित है। लेकिन आज यही होता है। यह समझना होगा कि आंसू गैस को 30, 40, 45, 50 डिग्री से चलाने पर क्या असर होता है। आंसू गैस सीधे दागना भी गलत है। पुलिस को यह पता होता है कि अगर पत्थरबाजी हो रही है तो कितनी दूर वह रहे, जिससे उन पर असर नहीं होगा, उनकी शील्ड उनका बचाव करेगी। लेकिन फिर क्यों वे इतना आगे बढ़ते हैं जिससे सीधे टकराव होता है। शर्मा ने कहा कि फायर का आदेश मिलने का मतलब यही नहीं है कि आप किसी को गोली मार दें। ट्रेनिंग पर नए सिरे से पुलिस महानिदेशकों के साथ बैठक कर समयोचित बदलाव किए जाने चाहिए। खासकर जब आने वाले समय में युवा-छात्र और गृहिणियों के प्रदर्शन इन सोशल साइट्स की वजह से बढऩे वाले हैं।
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