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दुनिया की सबसे महंगी दवा की कीमत दो करोड़ रुपए
-स्कॉटलैंड के लेसली को है पैरॉक्सीसमल नॉक्टरनल हेमोग्लोबिनूरिया नाम की बीमारी
Matrix News
| Jan 22, 2013, 06:01AM IST
एजेंसी लंदन
स्कॉटलैंड में रहने वाली लेसली को पैरॉक्सीसमल नॉक्टरनल हेमोग्लोबिनूरिया ((पीएनएच)) नाम की बीमारी है। इस बीमारी से राहत पाने के लिए वह दुनिया की सबसे महंगी दवा का इस्तेमाल कर रही है। जी हां लेसली की एक साल की दवा के लिए जो खर्च आता है उसे सुन कर कोई भी दांतो तले उंगली दबा सकता है। अपनी बीमारी के इलाज के लिए इसके लिए वो सोलिरिस नाम की दवा लेती हैं जिसकी कीमत प्रति वर्ष दो लाख 50 हजार पाउंड यानी करीब दो करोड़ रुपए है। दरअसल दुनिया में कई ऐसी विरली बीमारियां हैं जो केवल गिने-चुने लोगों को ही होती हैं। जाहिर है इन बीमारियों के लिए दवाएं भी खास होती हैं और साथ ही इनकी कीमत भी। सोलिरिस दुनिया की सबसे महंगी दवाई ।
जो बीमारियां दुनिया में मुठ्ठी भर लोगों को ही होती हैं उनके लिए बनने वाली दवाओं को ऑरफन ड्रग्स कहा जाता है। लेसली की बीमारी भी ऐसी ही है। लेसली की हालत ये थी कि उन्हें सीढिय़ों पर भी कोई उठाकर ऊपर ले जाता थाए कपड़े भी किसी और को पहनाने पड़ते थे। कभी-कभी तो बिस्तर पर भी करवट लेना भी मुमकिन नहीं होता था। लेकिन सोलिरिस दवा लेने के बाद से उनकी जिंदगी बदल गई है।
इतनी महंगी क्यों है दवाएं
पर सवाल ये है कि सोलिरिस जैसी महंगी दवाओं की कीमत और उससे होने वाले फायदे को आंका जाए तो ये दवाएं कितना कारगर साबित होती हैं सोलिरिस बनाने वाली कंपनी एलिक्सन का कहना है कि दवाई की कीमत उचित है क्योंकि इस दवा को बनाने में कंपनी को बहुत खर्चा आया और काफी जोखिम भी उठाना पड़ा। कंपनी के मुताबिक सोलिरिस उपलब्ध होने से पहले एक तिहाई मरीज़ पाँच साल के अंदर ही मर जाते थे। यूरोप में 60 से ज़्यादा ऑरफन ड्रग्स हैं यानी दुर्लभ बीमारियों के लिए बनी दवाएं। सभी ऑरफन ड्रग्स सोलिरिस जितनी महंगी तो नहीं है लेकिन ये उद्योग बड़ी कमाई वाला उद्योग बन गया है।
थॉमसन रॉयटर्स लाइफसाइंसिज़ की डॉक्टर किरण मिकिंग्स कहती हैं ऑरफन ड्रग्स की बाजार में कीमत करीब 50 अरब डॉलर है और ये बढ़ रहा है 60 फीसदी की दर से। हालांकि दवा उद्योग का कहना है कि बिरली बीमारियों की दवाएं अगर महंगी हैं तो इसलिए क्योंकि इन पर होने वाली शोध की कीमत बहुत है।
लेसली कहती है कि मेरे लिए ये दवा बेशकीमती है। सोलिरिस लेने के बाद से उनकी जिंदगी बदल गई है। ब्रिटिश फॉर्मास्यूटिकल उद्योग की डॉक्टर फ्रांसिस मैक्डॉनल्ड कहती हैं कि बाजार में नई दवा उतराने में करीब एक अरब पाउंड खर्च होते हैं। वैसे भी कई दवाओं के बीच से शायद एक दवा बाजार तक पहुंच पाती है। इसे बाकी सारी दवाओं का खर्च निकालना होता है। अब चर्चा इस बात पर है कि चंद मरीजों के लिए बनने वाली बेहद महंगी दवाओं का बोझ उठाने के लिए दवा उद्योग को सब्सिडी और कर रियायतें मिलनी चाहिए या फिर इससे लोगों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा।
दरअसल आखिर में ये बहस इसी बात पर निर्भर करती है कि दवा का दाम क्या है और जिंदगी में उसकी असली अहमियत क्या है। लेसली जैसे मरीजों की बात करें तो उनके लिए सोलिरिस दवा बेशकीमती है। लेसली कहती हैं कि मेरे परिवार के सामने वो स्थिति थी कि दस साल में मेरी मौत हो सकती थी। मेरे पति को बच्चों को अकेले ही पालना पड़ता। मेरे माता-पिता अपनी बेटी को खो देते लेकिन अब मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। स्कॉटलैंड में लेसली और आठ अन्य लोगों को इस तरह की महंगी दवा सरकार से मिल रही है।








