नई दिल्ली। वर्ष 2001 में लोकतंञ के मंदिर संसद पर हुए हमले के मामले में साजिश रचने के दोषी अफजल गुरू को आज सुबह आठ बजे तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई। यह पूरा मामला क्या था और अफजल की जिंदगी और अदालत से सजा ए मौत मिलने के बाद उसे फांसी पर चढ़ाने को लेकर कब-कब क्या हुआ, भास्कर डॉट कॉम इससे आपको अवगत करा रहा है। जम्मू-कश्मीर के बारामूला के सोपोर निवासी अफजल के जीवनक्रम के बारे में पूरी कहानी पढ़ें। (दिल्ली में फांसी का विरोध करने वालों के साथ क्या हुआ, देखिए)
एमबीबीएस कोर्स के प्रथम वर्ष की पढ़ाई पूरी करने के बाद अफजल प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा। इस दौरान वह जम्मू–कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट का सदस्य बन गया, जहां से उसे आतंकी ट्रेनिंग मिली। इन परिस्थितियों से कथित तौर पर नाखुश अफजल कश्मीर वापस चला गया और उसने वहां बीएसएफ के समक्ष सरेंडर कर दिया। इसके बाद उसने कमिशन एजेंसी का बिजनेस शुरू किया।
बिजनेस के दौरान वह अनंतनाग के रहने वाले तारीक के संपर्क में आया। जहां उसे कश्मीर की आजादी के लिए जिहाद में शामिल होने के लिए उकसाया गया, साथ ही उसे वित्तीय सहायता देने का आश्वासन भी दिया गया। तारीक ने उसे उस वक्त गाजियाबाद में रह रहे पाकिस्तान के आतंकियों से उसे मिलवाया और भारतीय संसद और अन्य दूतावासों पर हमले में मदद करने और फिदायीनों के दिल्ली में छिपने के लिए महफूज ठिकाने तलाशने को कहा।
आगे स्लाइड में पढ़ें अफजल की जिंदगी और फांसी की सजा मिलने के बाद से उसकी जिंदगी के उतार-चढ़ाव।
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