
धारावी जैसे तंग इलाक़े में दर्जनों ग़ैर सरकारी संस्थाए काम करते हैं लेकिन वो एक दूसरे को जानते तक नहीं
मुंबई की 50 फ़ीसदी आबादी या तो कच्ची बस्ती में रहती है या फिर सड़कों और पार्कों में. उनके इलाज, उनके बच्चों की पढाई और उनकी दूसरी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सैकड़ों गै़र सरकारी संस्थाएं स्थापित हैं.
इसके लिए इन संस्थाओं को सरकार और दान करने वाले लोगों से काफ़ी पैसे मिलते हैं.
लेकिन इन ग़ैर सरकारी संस्थाओं के काम काज के तरीक़े अपने पीछे कुछ सवाल भी छोड़ जाते है.
जैसे कि, क्या यह संस्थाएं इन पैसों का सही इस्तेमाल कर रही हैं? क्या उनकी सहायता का फ़ायदा समाज के पिछड़े वर्गो को मिल पा रहा है?
क्या वो अपनी गतिविधियां, अपने खर्चे और नीतियों को सच्चाई से प्रकाशित करते हैं?
हाल ही में प्रकाशित किए गए केंद्र सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार ग़ैर सरकारी संस्थाओं में काम काज के ढंग में पारदर्शिता की कमी है.
योजना आयोग इन एजेंसियों की निगरानी करती है जिसकी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यह संस्थाएं अपना काम उचित ढंग से नहीं कर रही हैं, इनके काम का असर समाज पर नहीं दिखाई देता और यह पैसों की बर्बादी करती हैं.
रिपोर्ट में ग़ैर सरकारी संस्थाओं को काफ़ी लताड़ा गया है.
इधर ग़ैर सरकारी संस्थाओं ने इस रिपोर्ट में खुद पर लगे आरोपों को ख़ारिज किया हैं.
हेल्पएज इंडिया नामक गैर सरकारी संगठन मुंबई की कच्ची बस्तियों में काफी काम करती है.
संगठन की अश्वनी गावडे मानती हैं कि कुछ संस्थाएं फ़र्ज़ी काम ज़रुर करती हैं.उन्होंने कहा, "कुछ ग़ैर सरकारी संस्थाएं केवल कागज़ पर काम करती है लेकिन हेल्पएज इंडिया वाकई काम करती है."
हेल्प एज मुंबई की चिंचपोकली बस्ती में डॉक्टरी मदद मुहैया कराती है. हेल्प एज के लिए मदद मुहैया कराने वाले डॉ प्रकाश कहते हैं, ''हम लोगों से केवल दस रुपये लेते हैं ताकि उन्हें यह न लगे कि हम मुफ्त में उनका इलाज कर रहे हैं.''
दोनों पक्ष सामने रखकर मै मुंबई की कई बस्तियों में गया और लोगों से पूछा कि वो ग़ैर सरकारी संस्थाओं के कामकाज के बारे में क्या जानते है.
ग्यानेश्वर नगर झोपड़ पट्टी में रहने वाले लोगों ने एक राय में ग़ैर सरकारी संस्थाओं पर आरोप लगाया कि उनमें काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता पैसे खाते हैं, काम सही से नहीं करते.
धारावी में कुछ स्थानीय लोगों को ग़ैर सरकारी संस्थाओं ने नौकरियां दी हैं और ज़ाहिर है कि वो इनके काम करने के तरीक़ों से वाकिफ़ थे.
भारतीय सरकार के खाते में 33 लाख़ ग़ैर सरकारी संस्थाओं के नाम दर्ज हैं. यानी की हर चार सौ भारतीयों पर एक ग़ैर सरकारी संस्था मौजूद है.
लेकिन इसके बावजूद हमें ऐसे लोग ज़्यादा मिले जिन्होंने न तो कभी ग़ैर सरकारी संस्थाओं का नाम सुना है और ना ही उनकी मदद ली है.
भारत में ग़ैर सरकारी संस्थाओं का बाज़ार गर्म है लेकिन उनके बीच कोई तालमेल नहीं नज़र आता.
झोपड़ पट्टी में रहने वाले लोगों ने एक राय में ग़ैर सरकारी संस्थाओं पर आरोप लगाया कि सामाजिक कार्यकर्ता पैसे खाते हैं
धारावी जैसे तंग इलाक़े में दर्जनों ग़ैर सरकारी संस्थाए काम करते हैं लेकिन वो एक दूसरे को जानते तक नहीं.
विशेषज्ञ कहते हैं आपसी ताल मेल से समय बचेगा, कम पैसों में काम हो पाएगा और लोगों को अधिक फायदा होगा.
ग़ैर सरकारी संस्थाओं के कामकाज पर नज़र रखने वाली एक संस्था आई कोंगो के कर्ताधर्ता जिरिनियो अल्मेडा कहते हैं, "देशी और विदेशी ग़ैर सरकारी संस्थाओं का बाज़ार लगा है लेकिन ज़रूरत की जगहों पर इनके काम का कोई असर नहीं दिखता है. इस लिए ज़रूरी है कि ग़ैर सरकारी संस्थाएं आपस में मिलकर काम करें. अपना काम खुला रखें और कुछ छिपाने की कोशिश न करें."
केन्द्रीय सरकार 33 लाख़ ग़ैर सरकारी संस्थाओं को एक प्लेटफ़ॉर्म पर लाने के लिए और उनकी जवाबदेही तय करने के लिए एक एजेंसी बनाना चाहती है.
हालाँकि ग़ैर सरकारी संस्थाए सरकार की इस योजना से सहमत नहीं हैं. वो कहते है कि इस दांव से सरकार ग़ैर सरकारी क्षेत्र को अपनी मुठ्ठी में करना चाहती है.
उनके अनुसार ग़ैर सरकारी संस्थाएं खुद के काम को खुद ही रेगुलेट करें तो इसका फ़ायदा ज्यादा होगा.