अब है राहुल गाँधी के इम्तिहान का समय
राजेश जोशी
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
क्या काँग्रेस संगठन में बड़ी ज़िम्मेदारी निभाने को तैयार हैं राहुल गाँधी?
नेहरू-गाँधी परिवार की राजनीतिक विरासत के कारण ‘युवराज’ और ‘राहुल बाबा’ के नाम से पुकारे जाने वाले राहुल गाँधी के लिए अब नए इम्तिहान का वक़्त आ रहा है.
मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में फेरबदल के बाद अब फिर से सभी निगाहें अब काँग्रेस महासचिव राहुल गाँधी पर केंद्रित हैं.
मंत्रिमंडल में उन्होंने कोई ज़िम्मेदारी नहीं ली है पर कहा जा रहा है कि अब पार्टी संगठन में उन्हें महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ सकती है.
काँग्रेस पार्टी के ढाँचे में बदलाव करके अगर राहुल गाँधी को कार्यकारी अध्यक्ष का ओहदा दिया जाता है तो चुनावी नतीजों का दारोमदार भी उन्हीं पर आएगा.
पार्टी संगठन में बड़ी ज़िम्मेदारी मिलने पर राहुल गाँधी के सामने गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव की चुनौती सामने है. खास तौर पर गुजरात में काँग्रेस को नरेंद्र मोदी को टक्कर देने में लोहे के चने चबाने होंगे.
छवि का संकट
यूपीए सरकार आर्थिक सुधारों की पुरजोर हिमायत के जरिए अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारना चाहती है.
पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे पहली ज़िम्मेदारी काँग्रेस और यूपीए सरकार की अंतरराष्ट्रीय छवि बदलने की है.
अंतरराष्ट्रीय मीडिया की ओर से अकर्मण्यता के आरोप लगने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ताबड़तोड़ आर्थिक सुधारों की घोषणा की.
साथ ही डीज़ल की कीमतें बढ़ाने का फैसला भी किया, हालाँकि उन्हें ये एहसास था कि इससे कॉरपोरेट में तो पार्टी की छवि सुधरेगी लेकिन आम लोग पस्त हाल होंगे.
राहुल गाँधी के सामने सबसे बड़ा सवाल होगा कि निवेशकों को माफिक आने वाली नीतियों का समर्थन करते हुए वो आम जन के साथ खड़े हुए भी नज़र आएँ.
राहुल गाँधी के आलोचक कहते रहे हैं कि वो बड़ी ज़िम्मेदारी लेने से बचते रहे हैं और जब उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मायावती के किले में सेंध लगाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया भी को असफल रहे.
कुछ समय पहले राहुल गाँधी की नेतृत्वकारी क्षमता पर दि इकॉनॉमिस्ट पत्रिका ने गंभीर सवाल खड़े किए थे. पत्रिका ने कहा था कि राहुल गाँधी में नेतृत्व के गुण नहीं दिखते. वो स्वभाव से शर्मीले हैं और मीडिया से संपर्क नहीं रखते.
मंत्रिमंडल के ताज़ा फेरबदल में युवा मंत्री तो आए हैं और कहा जा रहा है कि इस फैसले पर राहुल गाँधी की स्पष्ट मुहर है.
किसकी छाप?
राहुल गाँधी ने आम जन से सीधे संपर्क किया पर उसका राजनीतिक फायदा नहीं उठा पाए.
पर दरअसल कुछ मामलों में ये राहुल से ज़्यादा मनमोहन सिंह की सफलता है क्योंकि वो पार्टी पर लगातार हो रहे हमलों का हवाला देकर ही सही सोनिया और राहुल गाँधी को अपने ‘विज़न’ के करीब लाने में सफल रहे हैं.
मीडिया और कॉरपोरेट जगत में सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को व्यंग्य में ‘झोलेवाला ब्रिगेड’ कहा जाता रहा है क्योंकि इसे किसानों, मजदूरों और गरीबों के हित में हुए कई फैसलों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है.
इस तथाकथित ‘झोला ब्रिगेड’ में ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश और जयपाल रेड्डी जैसे मंत्रियों को भी शामिल किया जाता रहा है.
हालाँकि जयराम रमेश को सोनिया और राहुल के करीब माना जाता है पर पहले मनमोहन सिंह उन्हें पर्यावरण मंत्रालय से हटाने में कामयाब हुए और इस बार भी उनसे कुछ ज़िम्मेदारियाँ ले ली गई हैं.
इसी तरह पेट्रोलियम मंत्री के तौर पर रिलायंस और मुकेश अंबानी को छकाए रखने वाले जयपाल रेड्डी से इस बार मनमोहन सिंह ने मंत्रालय ही छीन लिया और उन्हें विज्ञान और तकनॉलॉजी मंत्रालय दे दिया गया.
ऐसे में जब काँग्रेस पार्टी पस्तहिम्मती के दौर से गुजर रही हो और आने वाले दिनों में उसे भारतीय राजनीति के कठिन युद्धों में हिस्सा लेना पड़े, तो राहुल गाँधी को चॉकलेटी बबुए की बजाए राजनीति के युद्ध में पारंगत सिपहसालार की भूमिका में उतरना पड़ेगा.









