रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उस ज़माने में ऐसे संचार साधन नहीं थे कि समाचार कहीं से भी दे दिया जाए.
बात 1993 के विधान सभा चुनाव की है. मतदान का कवरेज करना था. सुबह-सुबह मार्क टली के साथ निकले. लखनऊ से चिनहट होते हुए इंदिरा नहर पार कर सतरिख रोड पर गए. रास्ते में पता चला कि एक गाँव में दबंग लोगों ने एक दलित की पिटाई कर दी है. वह नही चाहते थे कि दलित परिवार अपना वोट डालने जाए. हम लोग वहाँ पीड़ित लोगों से बात करके आगे बाराबंकी पहुचे. उस ज़माने में न तो मोबाइल फोन थे न ही इंटरनेट था, इसलिए ख़बर देने के लिए हम एक पीसीओ गए. ख़बर देकर पुलिस मुख्यालय फोन किया, यह पता करने के लिए कि वायरलेस पर बाकी जगह से क्या समाचार हैं. तब पुलिस वायरलेस ही ज़िलों से इस तरह की ख़बरों का मुख्य स्रोत था. आज की तरह चौबीस घंटे लाइव टेलीविजन समाचार का प्रसारण नही था और न ही जगह जगह कैमरा लिए पत्रकार. पुलिस मुख्यालय से पता चला कि गोंडा में हिंसा हुई है और भारतीय जनता पार्टी सांसद सत्यदेव सिंह को गोली लग गयी है. हम लोग फ़ौरन गोंडा की ओर भागे. वहाँ पहुँचकर मालूम हुआ कि सत्यदेव सिंह गंभीर रूप से घायल हैं और उन्हें इलाज के लिए हेलीकाप्टर से लखनऊ ले जाया गया है. पीसीओ से ख़बर अपडेट करके वापस लखनऊ भागे. बाक़ी जगह के समाचार पता करने.
अलीगढ़ से एटा
इसके बाद दूसरे चरण में हमने अलीगढ़ से एटा होते हुए आगरा तक मतदान देखने का कार्यक्रम बनाया. एटा जिले में हम जा ही रहे थे तभी देखा कि लाठी लिए लोगों की एक भीड़ दूसरी भीड़ को खदेड़ रही है. कई लोग घायल भी हो गए थे. पता चला कि एक गुट मतदान केंद्र पर कब्ज़ा करने आया था, जिसे दूसरा गुट खदेड़ रहा था. हम लोग बिलकुल सही समय पर पहुच गए थे और हम रेडियो के लिए झगडे-होहल्ले की आवाज़ें रिकॉर्ड कर सके थे. ज़िला मुख्यालय पर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से मिले तो पता चला कि हिंसा में एक व्यक्ति की मौत भी हो गयी है.
बिना डाले पड़े वोट
पत्रकारों को अपने दफ़्तरों तक ख़बर पहुँचाने में मशक्कत करनी पड़ती थी.
इसी तरह एक बार मै मेरठ के क़रीब बागपत जिले में मतदान देखने गया तो मालूम हुआ कि ताक़तवर जाट समुदाय के लोगों ने दलित बस्ती में कह दिया था कि उन्हें पोलिंग बूथ तक जाने की जरुरत नही. उनका वोट पड जाएगा. कई उम्मीदवारों के एजेंट अपनी बिरादरी या समर्थकों पर भी भरोसा नही करते थे और वह उनसे कहते थे, ‘घर बैठो तुम्हारा वोट डल जाएगा’. उस ज़माने में मतदान के दौरान हिंसा, मतदाताओं को डराना-धमकाना, मारपीट और बूथ पर कब्ज़ा करके बोगस वोटिंग पोलिंग के दिन के मुख्य समाचार होते थे. चुनाव आयोग में रात भर ज़िला मजिस्ट्रेटों से रिपोर्ट ली जाती थी कि कहाँ-कहाँ पुनर्मतदान होना है. यह सब अब पुराने दिनों की बातें हो गयी हैं.
चुनाव इन दिनों
अब संचार साधनों का इतना विस्तार हो गया है कि इंटरनेट के ज़रिये पोलिंग बूथ से सीधे चुनाव आयोग दफ्तर तक लाइव स्ट्रीमिंग हो सकती है. हर आदमी के पास मोबाइल फोन है तुरंत वह फोन करके अफ़सरों और मीडिया को सूचना दे सकता है. लोग खुद भी मोबाइल फोन से फोटो या वीडियो खींचकर मीडिया और आयोग को भेज सकते हैं. मतदान केंद्र अब स्थानीय पुलिस या होमगार्ड की देख रेख में होने के बजाय राइफल धारी केंद्रीय सुरक्षा बालों के हवाले होते हैं, जो एक–दो दिन पहले फ्लैग मार्च करके मतदाताओं को सुरक्षा का एहसास कराते हैं और बूथ कब्जा करने वालों के दिलों में भय पैदा करते हैं. स्थानीय अधिकारी शासन सत्ता के दबाव में काम न करें इसलिए बाहर से प्रेक्षक तैनात हो रहें हैं. यह बात दीगर है कि चुनाव बंदोबस्त का सरकारी खर्चा बहुत बढ़ गया है. कुल मिलाकर चुनाव अब आयोग काफी प्रभावी हो गया है.