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धरा रह गया सोनिया गांधी का एजेंडा

पंकज कुमार पांडेय | Oct 12, 2012, 15:42PM IST
 
 

नई दिल्ली . लगातार सियासी झंझावात से जूझ रही कांग्रेस अपने संगठन को चाक-चौबंद करने का लगभग दो साल पुराना एजेंडा पूरा नहीं कर पा रही है। 4 नवंबर को बड़ी रैली के जरिए कांग्रेस मौजूदा राजनीतिक हालात पर पार्टी का पक्ष जोरशोर से रखेगी मगर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का चिंतन शिविर का वादा और चिंतन समूह बनाने की परिकल्पना को पूरा न करने पाने का मलाल पार्टी के भीतर है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि कई राज्यों के चुनाव और राजनीतिक स्थिति में लगातार बदलाव की वजह से निश्चित ही कुछ तय चीजें नहीं हो पाईं। हालांकि पार्टी लगातार अपने कार्यकर्ताओं को जोड़े रखने के लिए सूबों में और केंद्रीय स्तर पर अलग अलग तरीके से विचार-विमर्श कर रही है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 19 दिसंबर 2010 को बुराड़ी सम्मेलन में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था, 'मैं सोचती हूं कि इस समय जरूरी है कि पार्टी में एक चिंतन समूह बने, जो संस्थानों की शैली में काम करे।' उन्होंने वादा किया था कि जल्द इस विषय पर चर्चा पार्टी के भीतर होगी। सोनिया गांधी के वादे के बाद भी सियासी झंझावात से जूझ रही पार्टी अपनी सेहत सुधारने पर चर्चा के लिए कोई भी बड़ी चिंतन बैठक नहीं कर पाई।

कांग्रेस अध्यक्ष ने बुराड़ी में यह भी कहा था, 'मेरी यह निश्चित राय है कि हमें समय समय पर आत्म-चिंतन करते रहना चाहिए। अगर जरूरी हो तो समय के साथ महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी दृष्टि का पुनर्मूल्यांकन करते रहना चाहिए। यही वजह है कि पिछले समय में हमने पचमढ़ी में विचार मंथन शिविर और शिमला में चिंतन शिविर आयोजित किए थे। आने वाले महीनों में भी हम इस तरह का आयोजन करेंगे।' पार्टी अध्यक्ष का मानना था कि इससे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर अपने दृष्टिकोण को ताजा करने और संगठन की कार्यशैली की समीक्षा करने का मौका पार्टी को मिलेगा। कांग्रेस अध्यक्ष चाहती थीं कि ऐसे आयोजनों में युवाओं की बात सुनने का मौका मिले। इससे पार्टी को नई ऊर्जा मिलने की आस लगाई गई थी।

रैली से होगी कमी पूरी

हालांकि काफी समय बाद पार्टी एक बड़ी रैली करके पार्टी और केंद्र सरकार पर होने रहे लगातार वार का जवाब देने को तैयार है। 4 नवंबर की रैली में लाखों लोगों के एकत्र होने की उम्मीद पार्टी जाहिर कर रही है। पार्टी ने सभी राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों के साथ सांसदों, विधायकों को भीड़ एकत्र करने की जिम्मेदारी दी है। हिमाचल प्रदेश के लोगों को इस रैली में शामिल होने से छूट दी गई है क्योंकि इसी दिन हिमाचल प्रदेश का चुनाव है।
 
 
 

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