क्या है क्रेडिट कंट्रोल ?

भुगतान संतुलन जो किसी देश का बाहरी बैलेंस शीट होता है के नजरिये से देखें तो विदेशी मुद्रा का प्रवाह दो हिस्सों में बंटा होता है। पहला करंट अकाउंट यानि चालू खाता और दूसरा पूंजी खाता प्रवाह। चालू खाते में प्रवाह वस्तुओं और सेवाओं के लेनदेन से पैदा होता है और यह स्थायी प्रकृति का होता है।
विभिन्न तरह के कर्ज और इक्विटी निवेश में पूंजी खाते का प्रवाह जरूरी होता है। हालांकि इसे उल्टा भी किया जा सकता है।यही वजह है कि नीति-निर्माता पूंजी के प्रवाह पर पर नजदीकी निगाहें बनाए रखते हैं।
भारत में कॉरपोरेट और कारोबारी समूह की ओर लिए जाने वाले विदेशी कर्ज, अनिवासी भारतीयों के डिपोजिट और संस्थागत विदेशी निवेशकों की ओर से स्टॉक मार्केट में किए जाने वाले निवेश की वजह से देश में विदेशी मुद्रा आती है।
इसके अलावा सरकार की ओर से लिए जाने वाले कर्ज और छोटी अवधि के लोन लेने की वजह से देश में विदेशी मुद्रा यानि पूंजी आती है। भारत पूंजी और चालू खाते में होने वाले लेनदेन पर नियंत्रण के जरिये पूंजी नियंत्रण करता है। केंद्रीय बैंक इसके लिए स्थायी करंसी का मूल्य निर्धारित करता है। हालांकि 1991 में जब भारतीय अर्थव्यवस्था के ढांचे में परिवर्तन हुआ तो रुपये को चालू खाते में पहली बार परिवर्तनीय किया गया।1994 में एक बड़ा परिवर्तन किया गया।






