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Anuj Khare


देश की बड़ी पत्र - पत्रिकाओं में व्यंग्य लेखों का नियमित का प्रकाशन। दो व्यंग्य संग्रह- चिल्लर चिंतन, परम श्रद्धेय, मैं खुद। फिलहाल दैनिक भास्कर समूह की साइटों में कार्यकारी संपादक।
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सियासी मंच से देश चिंतन...

व्यंग्य

बड़े मंचों से अपनी बात कहने का बड़ा कायदा होता है। जोरदार सलीका होता है। अक्सर कायदा इतना कायदे का हो जाता है या सलीका इतना सलीकेदार हो जाता है कि इनके चक्कर में मूल मुद्दा ही गुम हो जाता है। आइए देखते हैं कैसे..?गंभीर चर्चा के लिए सियासी मंच सजा है। मुद्दा गंभीर है। साथ...

Posted on 523 days ago

हर बजट की एक आम कहानी

व्यंग्य

एक बजट होता है। एक राज्य होता है। राज्य का एक बजट होता है। हर राज्य का एक बजट होता है। हर राज्य में एक मुख्यमंत्री होता है। हर राज्य में एक वित्तमंत्री भी होता है। मुख्यमंत्री वित्तमंत्री से बजट बनाने को कहता है। वित्तमंत्री बजट बनाता है। बजट में राज्य को आगे ले जाने...

Posted on 578 days ago

वे चिंतित हैं : देश कहीं गर्त में न गिर जाए!

व्यंग्य

हैं तो वे मूलत: हमारे पुराने मित्र। ऊपर से संवेदनशील हैं। स्वाभाविक है इंसान हैं तो होंगे ही.. जब-तब भावनाओं में बह जाते हैं। हर राष्ट्रीय मुद्दे पर उद्वेलित हो जाते हैं। कांपने लगते हैं। ज्यादा गुस्सा हो जाते हैं तो खांसने भी लगते हैं। ‘हैं जी! क्यों होगा जी! देश गर्त...

Posted on 612 days ago

बैठे-बिठाए हो जाना बुद्धिजीवी

व्यंग्य

विचार का भुर्ता बनाए सो बुद्धिजीवी। जो विचार से निकले ज्ञान को सामने वाले पर दे मारे। नहीं ले तो उसे जमकर कोसने में लग जाए। सामने वाला बिदककर भागे तो फिर उसे बिठाके दचक डाले। ज्ञान के नाखूनों से हर मनुष्य का मूं भंभोड़ दे। एक विचार की दाल न गले तो तो हार न माने, नए विचार...

Posted on 612 days ago

विचारों का मुर्दा, स्पेस का ताबूत..

व्यंग्य

भाई साब! जरा एक अच्छा सा पीस तो भिजवा दीजिए। बस जरा शब्द सीमा का ध्यान रखिएगा। स्पेस का तो आपको पता ही है ज्यादा नहीं है। स्पेस का झंझट है! हर कहीं। अखबारों में, मैगजीन में, रिश्तों और जिंदगी में तो खैर है ही, शाश्वत समस्या की तरह। हालांकि यहां बात लेखन-विचारों के लिए...

Posted on 635 days ago

रचनात्मक स्तरहीन सपाट रचना पर साधुवाद

व्यंग्य

विनम्र आलोचक नए लेखक की तरह सादर समालोचना करता है, जो कुछ इस तरह हो सकती है-महोदय, आपकी बेहद रचनात्मक स्तरहीन और सपाट रचना को पढ़कर मेरा मन उत्साह से भर उठा। आप कह सकते हैं कि झूमने वगैरह भी लगा। उत्साह से इसलिए भरा कि आपकी इस अकेली रचना ने ही लेखन का सपना देखने वाले...

Posted on 684 days ago

देशसेवा के लिए कुर्बानियां लगती हैं भई..

व्यंग्य

देशसेवा जनता के त्याग-बलिदान पर ही तो होती है.. आगे की चर्चा का सार यही है। कल चौराहे पर जलसा होने वाला है। बड़े नेता आएंगे, सो सड़क को धो-पोंछकर चमका रहे हैं। अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं। मोची दादा अपनी दुकान से देख रहे हैं। नेताजी बड़े भी हैं, भाषण भी बड़ा ही देते हैं। सुना...

Posted on 684 days ago
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