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सियासी मंच से देश चिंतन...

सियासी मंच से देश चिंतन...

बड़े मंचों से अपनी बात कहने का बड़ा कायदा होता है। जोरदार सलीका होता है। अक्सर कायदा इतना कायदे का हो जाता है या सलीका इतना सलीकेदार हो जाता है कि इनके चक्कर में मूल मुद्दा ही गुम हो जाता है। आइए देखते हैं कैसे..?गंभीर चर्चा के लिए सियासी मंच सजा है। मुद्दा गंभीर है। साथ...(545 days ago)

हर बजट की एक आम कहानी

हर बजट की एक आम कहानी

एक बजट होता है। एक राज्य होता है। राज्य का एक बजट होता है। हर राज्य का एक बजट होता है। हर राज्य में एक मुख्यमंत्री होता है। हर राज्य में एक वित्तमंत्री भी होता है। मुख्यमंत्री वित्तमंत्री से बजट बनाने को कहता है। वित्तमंत्री बजट बनाता है। बजट में राज्य को आगे ले जाने...(600 days ago)

वे चिंतित हैं : देश कहीं गर्त में न गिर जाए!

हैं तो वे मूलत: हमारे पुराने मित्र। ऊपर से संवेदनशील हैं। स्वाभाविक है इंसान हैं तो होंगे ही.. जब-तब भावनाओं में बह जाते हैं। हर राष्ट्रीय मुद्दे पर उद्वेलित हो जाते हैं। कांपने लगते हैं। ज्यादा गुस्सा हो जाते हैं तो खांसने भी लगते हैं। ‘हैं जी! क्यों होगा जी! देश गर्त...(634 days ago)

बैठे-बिठाए हो जाना बुद्धिजीवी

विचार का भुर्ता बनाए सो बुद्धिजीवी। जो विचार से निकले ज्ञान को सामने वाले पर दे मारे। नहीं ले तो उसे जमकर कोसने में लग जाए। सामने वाला बिदककर भागे तो फिर उसे बिठाके दचक डाले। ज्ञान के नाखूनों से हर मनुष्य का मूं भंभोड़ दे। एक विचार की दाल न गले तो तो हार न माने, नए विचार...(634 days ago)

विचारों का मुर्दा, स्पेस का ताबूत..

भाई साब! जरा एक अच्छा सा पीस तो भिजवा दीजिए। बस जरा शब्द सीमा का ध्यान रखिएगा। स्पेस का तो आपको पता ही है ज्यादा नहीं है। स्पेस का झंझट है! हर कहीं। अखबारों में, मैगजीन में, रिश्तों और जिंदगी में तो खैर है ही, शाश्वत समस्या की तरह। हालांकि यहां बात लेखन-विचारों के लिए...(657 days ago)

रचनात्मक स्तरहीन सपाट रचना पर साधुवाद

विनम्र आलोचक नए लेखक की तरह सादर समालोचना करता है, जो कुछ इस तरह हो सकती है-महोदय, आपकी बेहद रचनात्मक स्तरहीन और सपाट रचना को पढ़कर मेरा मन उत्साह से भर उठा। आप कह सकते हैं कि झूमने वगैरह भी लगा। उत्साह से इसलिए भरा कि आपकी इस अकेली रचना ने ही लेखन का सपना देखने वाले...(706 days ago)

और खबरें

देशसेवा के लिए कुर्बानियां लगती हैं भई..

व्यंग्य

देशसेवा जनता के त्याग-बलिदान पर ही तो होती है.. आगे की चर्चा का सार यही है। कल चौराहे पर जलसा होने वाला है। बड़े नेता आएंगे, सो सड़क को धो-पोंछकर चमका रहे हैं। अतिक्रमण हटाए जा रहे हैं। मोची दादा अपनी दुकान से देख रहे हैं। नेताजी बड़े भी हैं, भाषण भी बड़ा ही देते हैं। सुना...

Posted by Anuj Khare |Posted on 706 days ago

मौन की मौत मारने में माहिर महान मनीषी..

व्यंग्य

पृथ्वी चुप है। आकाश भी खामोश है। दालान में बैठे दद्दा की तरह देश हकबकाया सा है। वे भी बस, मौन ही हैं।वे मौन क्यों हैं? बोलते क्यों नहीं हैं? आखिर मौन से उन्हें हासिल क्या है? यक्ष ने सदियों बाद वक्त के सामने उत्तम क्वालिटी का प्रश्न रख दिया है। अब जवाब भी भला क्या होगा...

Posted by Anuj Khare |Posted on 706 days ago
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