महल जो मजार बन गया
चिनियोट हमारा एक ऐसा शहर है, जिसके रहने वाले बंटवारे से पहले कोटख से गहरा रिश्ता रखते थे और यह रिश्ता दो सौ बरस पुराना था। सदियों से चिनियोट लकड़ी के काम के लिए मशहूर है। इसके कारीगरों के तराशे हुए झरोखें, खिड़कियां, दरवाज़े और फर्नीचर हिंदुस्तान भर में खरीदे जाते थे। और चिनियोट हुनरमंदों की उंगलियों को दाद दी जाती थी, जो इतने हसीन बेल-बूटे लकडिय़ों को छील कर बनाते थे। कोटख बंदरगाह से उनका सामान पानी के जहाज़ों में भरकर सारी दुनिया में जाता था और हिंदुस्तान के लिए दौलत के साथ शोहरत भी कमाता था।
उस ज़माने में चिनियोटियों के दो घर होते थे। एक कोटख और एक चिनियोट में।
बंटवारे के बाद भी उनके दो घर हैं। एक कराची में और एक अपने पुरखों के शहर
में। चिनियोट में एक घर ऐसा है, जो बंटवारे से पहले बना, लेकिन कभी आबाद न
हो सका और आज जब वहां धूल उड़ती है, तब भी महल कहलाता है। इस महल में
तह$खाने को मिलाकर पांच मंजि़लें हैं, लेकिन न तह$खाने में जाना मुमकिन है
और न ही ऊपरी मंजि़लों पर। यह महल एक चिनियोट कारीगर 'बरछा ने बनाया था।
उस महल के मालिक उमर हयात ने 'बरछाÓ का इंत$खाब इसलिए किया कि उस वक़्त के
बरतानवी शाही $खानदान ने बकिंघम पैलेस के कई हिस्सों की सजावट 'बरछा से
करवाई थी और उस की शोहरत हिंदुस्तान भर में फैली थी।
बरछा ने महल को बनाने का काम 1992 मे किया और अभी यह महल बन ही रहा था कि
उमर हयात इस दुनिया से रु$खसत हुआ। उसकी बेवा और बेटे ने शौहर और बाप की
ख़्वाहिश की तकमील के लिए 'बरछाÓ से कहा कि वो काम को जारी रखें। महल की
आराइश के लिए टाइल्स जापान से, शीशा इटली से, झाड़-फानूस बेल्जियम और
फ्रांस से मंगवाए गए थे। महल तैयार हुआ तो वो 'बरछाÓ की उंगलियों की
हुनरकारी का ऐसा शाहकार था, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे।
उमर हयात की बेवा ने महल के पूरा होने के बाद अपने इकलौते बेटे गुलज़ार
हयात की शादी का ऐहतेमाम किया, जिसके नाम पर उस शानदार इमारत का नाम रखा
गया था। आसपास के $कस्बों और देहातों में रहने वालों के अलावा पंजाब,
दिल्ली और दूसरे शहरों से उस वक़्त के रईस मुसलमान, हिंदू, सिख और अंग्रेज़
अफसरों को शादी की दावत दी गई। 'गुलज़ार महल की सजावट और चिरा$गां पर मां
ने दौलत पानी की तरह बहाई। क्यूं न बहाती, आखिर शादी इकलौते बेटे की थी।
वलीमे की सुबह उस घर के रहने वालों पर एक $कयामत का सामान लाई। हादसे की
असल वजह का इल्म तो अब तक न हो सका, मगर सुना है कि दूल्हा ग़ुसल$खाने के
हमाम में दम घुटने की वजह से इंत$काल कर गया। बेवा मां ने जनाज़ा उठने न
दिया और महल के दालान में ही दफन करवा दिया। बेटे की मौत के एक साल बाद उमर
हयात की बेवा भी चल बसीं और वो भी अपने बेटे के पहलू में ही दफन हुईं।
कटहरे में मौजूद $कब्रें उमर हयात की बेवा और उनके बेटे गुलज़ार की हैं।
पहली मंजि़ल की छत इतालवी तजऱ् पर बनाई गईं हैं, जिस पर चारों तरफ
हिंदुस्तान के ऐतिहासिक मंज़र की तस्वीरकशी की गई है। लाहौर के शालीमार
बा$ग से आगरे के ताजमहल और कांगड़ा की पहाडिय़ों से जयपुर के जंतर-मंतर तक
बनाने वाले ने उस वक़्त का पूरा हिंदुस्तान इस छत पर रंग डाला है।
अब इस $खस्ताहाल महल के जीर्णोद्धार का काम चल रहा है। चिनियोटियों का
कहना है कि यह हमारी ऐतिहासिक विरासत है और इसे यूं बर्बाद नहीं होना
चाहिए। वो लोग जो अविभाजित पंजाब की तारी$ख से वा$िकफ नही हैं, वो इसे
पंजाब का एक शानदार विरसा $करार देते हैं, जिसमें बरछा की ज़ेरे निगरानी
मुसलमानों के अलावा सिख और हिंदू कारीगरों ने भी हिस्सा लिया था।
यह महल जो मज़ार बन गया, अब उसे नए सिरे से सजाया और संवारा जा रहा है और उसकी निचली मंजि़ल पर एक लायब्रेरी $कायम कर दी गई है।
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