Home >> Blogs >> Bloggers >> Chetan Bhagat >> मराठियों को अपने ही पहुंचा रहे नुकसान
Chetan Bhagat


चेतन भगत एक भारतीय लेखक हैं। नॉवेल, स्टोरीज़ और कॉलम लिखने के साथ साथ वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। देश की 5 बेस्टसेलिंग नॉवेल के वे लेखक हैं। उनकी पहली नॉवेल 'फाइव प्वाइंट समवन' 2004 में आई थी जो बेस्टसेलर बनी। उसके बाद 2005 में 'वन नाइट एट द ... Expand 
9 Blogs | 41 Followers
Chetan Bhagat के अन्य ब्लॉग

मराठियों को अपने ही पहुंचा रहे नुकसान

Chetan Bhagat|Nov 14, 2012, 15:34PM IST
पिछले दिनों महाराष्ट्र में एक उभरती राजनीतिक पार्टी ने गैर-मराठियों द्वारा मराठियों के लिए समस्याएं पैदा करने के नाम पर काफी हंगामा बरपाया। इसके निशाने पर मुख्यत: बिहारी थे, जो बड़ी संख्या में काम की तलाश में दूसरे प्रदेशों में जाते हैं। इस पार्टी का कहना था कि महाराष्ट्र में काम की तलाश में आने वाले लोगों की वजह से मराठियों के रोजगारों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव पड़ता है।

उनका मानना है कि राज्य की अर्थव्यवस्था और पीने के पानी से लेकर रीयल एस्टेट और विज्ञापित नौकरियों तक तमाम संसाधनों पर मराठियों का हक है। इस तथ्य को बड़ी सहजता से नजरअंदाज कर दिया गया कि मुंबई में कारोबार कर रही कंपनियों या वहां के किसानों समेत सब अपने उत्पाद देशभर में कहीं भी बेच सकते हैं और इस तरह वे हर जगह से कमाई करते हैं। संकीर्ण सोच से प्रेरित उनकी राजनीतिक बयानबाजियों में कभी इस बात का भी जिक्र नहीं किया गया कि मराठी युवा किसी भी भारतीय युवा की तरह आईआईटी जैसे राष्ट्रीय संस्थान में दाखिला ले सकता है या आर्मी ज्वाइन कर सकता है। 

यदि आप जरा-सी भी तार्किकता का इस्तेमाल करें तो उनका गैर-मराठियों को बाहर रखने या फिर उन्हें महाराष्ट्र की बिगड़ी हालत के लिए जिम्मेदार ठहराने का आक्षेप औंधे मुंह गिरेगा। लेकिन हम भारतीय तर्क के लिए नहीं जाने जाते। हमारी फिल्में हों या राजनीति, सब जगह तर्क से ज्यादा भावनाएं मायने रखती हैं। गैर-मराठियों पर आक्षेप एक तरह से सामूहिक भाव-विरेचन है, जो मराठियों के एक हिस्से को अपना गुबार निकालने की इजाजत देता है। 

मुंबई में आज आदमी से लेकर विदर्भ के सूखे की मार झेल रहे गरीब किसानों तक हर कोई दुखी है। ऐसे में इसके लिए किसी को दोष देना अच्छा ही है, खासकर तब जबकि आपका नेता भी इस पर मुहर लगाता हो। भावनाओं से संचालित लोगों को समझाना बहुत मुश्किल होता है। इसी वजह से कट्टरपंथी राजनेता फलते-फूलते हैं, जबकि तार्किक बात कहने वाले डूब जाते हैं।

अलबत्ता महाराष्ट्र में हालात की असली विडंबना पिछले पखवाड़े में सामने आई, जब वहां मराठियों द्वारा मराठियों के खिलाफ किया गया सबसे बड़ा सिंचाई घोटाला उजागर हुआ। इस घोटाले के मुख्य आरोपी बिहारी नहीं हैं। यदि आप सोचते हैं कि एक बाल्टी पानी के लिए लाइन में लगने वाला गरीब प्रवासी परिवार मुंबई की समस्याओं की वजह है तो एक बार फिर सोचें। यह अच्छे मराठियों द्वारा चुनकर सत्ता में भेजे गए कुछ बदनीयत मराठी ही हैं, जिन्होंने अपने ही भोले-भाले लोगों को बुरी तरह ठग लिया। यह मराठी राजनेता ही हैं, जो देश की एक बेहद भ्रष्ट राज्य सरकार को चला रहे हैं। यह आपके अपने लोग हैं, जिन पर आपने भरोसा जताया और उन्होंने ही राज्य को पिछड़ा बनाए रखा। महाराष्ट्र के इतना गरीब होने का कोई कारण नहीं है। 

इसके पास एक विशाल शिक्षित वर्ग, मेहनती श्रमशक्ति, विशाल भूभाग, पर्याप्त कनेक्टिविटी और मुंबई के रूप में देश की वाणिज्यिक राजधानी भी है। फिर भी यहां के किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या करने पर विवश हैं। राज्य सरकार सिंचाई परियोजनाओं के नाम पर अपने दोस्तों व करीबियों के वारे-न्यारे करती रही है। उन्होंने किसानों को गरीब और खुद को व अपने दोस्तों को अमीर बनाए रखा। हालांकि इस तरह के मसलों पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है। जब भी इस बारे में कुछ कहा जाता है तो मराठी राजनेता गैर-मराठियों पर उंगली उठा देते हैं या ध्यान भटकाने की कोई दूसरी तरकीब अपनाते हैं। आखिर वे ऐसा कैसे कर पाते हैं? क्योंकि वे मराठी आबादी को बहुत हल्के में ले सकते हैं।

हालिया सिंचाई घोटाले से जुड़ी एक और विडंबना पर नजर डालें। जिस दिन आरोपी उपमुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया, उनकी पार्टी के दूसरे मंत्री भी इस्तीफा देने की धमकी देने लगे। दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में किसानों के खिलाफ किए गए व्यापक भ्रष्टाचार का आरोपी राजनेता और कुछ नहीं तो कम से कम राजनीतिक रूप से अस्पृश्य जरूर बन जाता। मगर यहां तो उनकी पार्टी के तकरीबन सभी लोगों ने उनके प्रति एकजुटता दिखाई, मानो आरोपी भी कहीं न कहीं पीड़ित है। मंत्रियों ने आरोपी का पक्ष लेना इसलिए उचित समझा क्योंकि उन्हें यकीन था कि इससे उनकी चुनावी संभावनाओं पर असर नहीं पड़ेगा। वास्तव में आरोपों के बावजूद लीडर को त्यागना एक खराब रणनीति हो सकती थी। दूसरे शब्दों में, महाराष्ट्र के लोग मतदान करते वक्त भ्रष्टाचार के बारे में नहीं सोचेंगे। वे सिर्फ अपने पूजनीय मराठी नेताओं की परवाह करेंगे और उनके सगे-संबंधी उन पर राज करते रहेंगे। भले ही इसका मतलब यह हो कि किसानों को कभी अच्छी सिंचाई सुविधाएं और मुंबई को बेहतर सड़कें नहीं मिलेंगी।

ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि वहां कौन किसे नुकसान पहुंचा रहा है? क्या वास्तव में बिहारी ही मराठियों को ठेस पहुंचा रहे हैं? या फिर इस कड़वी हकीकत को स्वीकार करने का वक्त आ गया है कि महाराष्ट्र के पिछड़ने की वजह बदनीयत मराठी ही हैं, जो अच्छे मराठियों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। चाहे यह विभाजनकारी या भ्रष्ट नेताओं पर सिर्फ इसलिए अंधविश्वास करना हो कि वे मराठी हैं; या फिर यह मतदान के वक्त क्षेत्रीय अस्मिता बनाम मुद्दे के आधार पर चयन का गलत पैमाना हो, लेकिन मराठी इस तरह खुद को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं। मैं यह सब इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मुझे अपने इस गृहप्रदेश की परवाह है, जिसने मुझे अपनाया है। महाराष्ट्र का निवासी होने के नाते लोगों को हर दिन कष्ट भोगते हुए देखना दुखद है। वे बेहतर जिंदगी के हकदार हैं। मराठी समुदाय के नेताओं और बुद्धिजीवियों को आत्मावलोकन करना होगा। हम उस समुदाय की गरिमा को फिर से बहाल करें, जो कुछ विश्वासघातियों की वजह से क्षीण हो गई है। इसके अलावा हमें इस बात का भी अहसास करना होगा कि जिंदगी में यही बात ज्यादा मायने रखती है कि लोग अच्छे हैं या बुरे, न कि वे मराठी हैं या गैर-मराठी। 
आपके विचार

 
कोड :
10 + 8

Other Bloggers

विज्ञापन

Popular Blogs

Featured Bloggers

Popular Categories

| Email Print Comment