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Anuj Khare


देश की बड़ी पत्र - पत्रिकाओं में व्यंग्य लेखों का नियमित का प्रकाशन। दो व्यंग्य संग्रह- चिल्लर चिंतन, परम श्रद्धेय, मैं खुद। फिलहाल दैनिक भास्कर समूह की साइटों में कार्यकारी संपादक।
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मौन की मौत मारने में माहिर महान मनीषी..

Anuj Khare|Nov 14, 2012, 16:09PM IST
पृथ्वी चुप है। आकाश भी खामोश है। दालान में बैठे दद्दा की तरह देश हकबकाया सा है। वे भी बस, मौन ही हैं।

वे मौन क्यों हैं? बोलते क्यों नहीं हैं? आखिर मौन से उन्हें हासिल क्या है? यक्ष ने सदियों बाद वक्त के सामने उत्तम क्वालिटी का प्रश्न रख दिया है। अब जवाब भी भला क्या होगा यार। अरे किसी ने कुछ हासिल करने के लिए विकट साधना की है। कठिन तपस्या कर डाली है। तगड़ा अभ्यास साधा लिया है। तेज आवाज, नारों के क्षणों में भी समाधि लगा लेने की काबिलियत विकसित कर डाली है। तो इन खाली बैठे यक्षों के पेट में दर्द होने लगता है। प्रश्न उछालने लगते हैं। देखते तक नहीं सामने वाला मौन है लेकिन ममता से भरा है। विपक्ष और वरिष्ठों के प्रति कितनी करुणा भाव रखता है। चीख-चिल्लाकर फाड़ लो गला, उखाड़ोगे क्या? इस छोटी सी बात को हमेशा नादानो को समझाने में लगा रहता है।

लेकिन यक्ष समझें तब न, बस नेतागिरी करते रहेंगे। जवाब दो, जवाब दो। घंटा जवाब, अरे वे जानते हैं खुराफाती होशियारी करते रहते हैं उससे क्या होता है। कोई असर होता है क्या? और मान लो कभी हो भी गया तो 65 साल में विपक्ष को क्या फायदा मिल गया है जो अब मिलेगा। सो, एकदम निश्चिंत रहते हैं। निश्चिंत ही रहते थे। मौन तो पहले से ही थे। इसलिए अपनी हरकत पर दिन में दो-तीन दफे प्रफुल्लित भी बने रहते हैं।
लगे हाथों ऊर्जा संरक्षण के प्रति प्रेम भी रखते हैं।

 सो, अपनी वाक् ऊर्जा संरक्षित ही रखते हैं। पता नहीं कब जरूरत पड़ जाए? उस ‘पता नहीं कब..’ वाली जरूरत के लिए हर उपलब्ध मौके पर बोलने से बचते हैं। यूं तो बोलते भी क्यों, जरूरत ही क्या थी। बिना बोले ही धमाधम सीढ़ियां ऊपर चढ़ रहे हैंे। आगे बढ़ रहे हैं।

अब फिर यक्ष कुछ बोले इससे पहले वे खुद ही बता देंगे कि हां भाई हां कई बार अपने  प्रति पवित्र ग्लानि हो आती है। खुद पर दिव्य आक्रोश भी प्रकट करता हूं। फिर क्रोध पर विजय पाने के लिए मौन समाधि में चले जाते हूं, बस। हालांकि उनके इस मौन ने सियासत में कई शोर मचाने वाले सिद्दांतों का निर्माण कर डाला है। जिसकी दूरदर्शी व्याख्याएं भी फटकार दी गई हैं। उन्हें पता चला तो बस मुस्कुरा कर ही रह गए। मुस्कुराने में आवाज नहीं निकलती है। खीं.खीं. करने के वे सख्त खिलाफ हैं। ऐसी हंसी के क्षणों में बस मुंह दाब लो। छाती भले ही फटने को हो जाए सांस तक न लो। बस, कसकर पी जाओ हंसी। मुंह पर दही जमा लो। हंसी के कल्ले न फूट जाएं कहीं। हाव-भाव की कोपलें न दिख जाएं। कुल मिलाकर चेहरे पर पूर्णविराम लगा लो। मुंह पर ताला लगाकर चाबी दरिया में फेंक दो।

सो, वे मौन की मौत मारते हैं लोगों को, तड़पा-तड़पाकर। बोलो-बोलो कुछ तो बोलो..जनाब, कुछ तो अर्ज कीजिए.. जैसे आवेदनों पर भी नहीं पसीजते। हम काए बोलें, तुमई बक लो। बोलवे मै का धरो है? हमाए बोलवे पै देस सुनवै का। ज्यादा उकसाओ तो मुक्का दिखा-दिखाकर पेट में मारने का इशारा करते हैं। सिर हिला-हिलाकर मुंडी फोड़ने की बात भी बिना बोले ही सामने वाले को समझा देते हैं। विपक्ष सिर धुनता है।

मौन हैं न, ऊर्जा क्षय नहीं होनी चाहिए। उसी फुस्सी बम की तरह जिसकी सारी आग उसकी बाती में होती है। अंदर का बारूद तो उपयोग के इंतजार में कब का माटी हो चुका होता है।

यक्षों को इसकी खबर नहीं लेकिन उन्हें पता है। इसलिए वे मौन हैं। दूरंदेशी से भरे.! आगे बढ़ते हुए.!
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