Anuj Khare
देश की बड़ी पत्र - पत्रिकाओं में व्यंग्य लेखों का नियमित का प्रकाशन। दो व्यंग्य संग्रह- चिल्लर चिंतन, परम श्रद्धेय, मैं खुद। फिलहाल दैनिक भास्कर समूह की साइटों में कार्यकारी संपादक।
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देशसेवा के लिए कुर्बानियां लगती हैं भई..
Anuj Khare|Nov 14, 2012, 16:10PM IST
‘पहले यूनियन के नेता रहे हैं..’ मोची काका की दुकान पर बैठा बनवारी बता रहा था, ‘पूरी बस्ती गुण गाती है। कोई कहीं अटका और उनके दरवाजे पर मत्था टेकने पहुंच जाता है। अपने भाई-भतीजों जैसा ही सबका ख्याल है इन्हें। जो एक बार नजर में चढ़ा, समझो निहाल..।’ मोची काका ने बाजू वाले मटरू को आवाज देकर दो चाय लाने को कहा। ‘अब भइया, इनकी नजर में कैसे चढ़ते हैं, ये भी तो बताओ।’ वह उत्सुकता के साथ बनवारी से विवरण लेने में जुटे थे।
‘समोसे भी तो मंगवा लो, यूं ही सुन लोगे क्या..।’ बनवारी ने डिमांड रख दी। ‘ज्यादा भाव न खाओ बनवारी, अभईं तो बोहनी भी न हुई है..।’ मोची काका ने मजबूरी जताई।
‘तो उस दिन सुन लेना, जिस दिन बोहनी हो जाए।’ काका परेशान। जवान बेटा घर में बैठा है। कच्चा छप्पर है। वो अतिक्रमण हटाने वाले जब-तब दुकान फेंकने की धमकी देते रहते हैं। बड़े लोगों से मेलजोल हो जाए तो बात जम जाए।
समोसे और चाय की प्रारंभिक व्यवस्था के बाद बनवारी काम की बात पर आया।
‘अरे, काका हमरे साथ चलिओ नेताजी के घर, चार-छह चक्कर लगाहो सो खुदई उनकी नजरों में आ जैहो..।’
‘सुनी है सभई विभागों में चलती है।’ मोची काका बनवारी से सीधे-सीधे कह नहीं पा रहे थे कि नजर में आ जैहें तो झुग्गी बच जाएगी। या कहीं सैटिंग जम गई तो बच्चा रोजगार से लग जाएगा।
नजर में आना है। बनवारी के साथ दस-बीस क्या, सुबह-शाम सौ-सवा सौ चक्कर लगाएंगे बंगले के। नजर में कैसे न आएंगे! चलती है नेताजी की। झुग्गी भी बचेगी और लड़का भी ठिकाने से लगेगा। मारे खुशी के अपना समोसा भी बनवारी को खिला दिया काका ने। उस दिन शाम होते न होते दुकान उठाकर घर की तरफ लपके। पुरानी पेटी से पैबंदवाला कुर्ता भी ढूंढ़-ढांढ़कर कर निकाल लिया। नेताजी के पास तो कुर्ते में जाना ही जंचेगा।
नींद में भी बंगले के भीतर घुसने और नेताजी के चरण स्पर्श वाले सीन की रिहर्सल चलती रही। झुग्गी बचेगी, बेटे की सैटिंग बैठेगी। नजर में आना है। निहाल होना है। रातभर एक मिनट को भी आंख न लगी। सुबह-सुबह ही तो भाषण है नेताजी का। कुर्ता पहनकर बिना चाय पिए ही दुकान की तरफ लपके। दुकान पर बैठे-बैठे नेताजी को देख लेंगे। बस चला तो वहीं नेताजी के चरण पकड़ लेंगे। बूढ़ी टांगे कांपते हुए दुकान का सफर तय कर रही थीं। दूर से ही नेताजी की आवाज सुनाई देने लगी। ‘भाइयो, हमारे परिवार ने देश के लिए कुर्बानियां दी हैं, आज सबको कुर्बानियों के लिए तैयार रहना होगा। हम भी स्वार्थ में पड़ गए तो देश गर्त..।’
धड़ाम..भीड़ ने पलटकर देखा। मोची काका अपनी दुकान के पास जमीन पर गिरे हुए थे, नि:श्वास। दुकान कहीं नजर नहीं आ रही थी। नेताजी के भाषण के लिए अतिक्रमण हटाने वालों ने..
नेताजी की आवाज गूंज रही थी- हमें कुर्बानी देने को तैयार रहना होगा..!
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