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J P Chowksey


जाने-माने फिल्म समीक्षक और कॉलमिस्ट हैं। लगभग 17 सालों से नियमित रूप से दैनिकभास्कर में 'परदे के पीछे' कॉलम लिख रहे हैं। कई फिल्मों का लेखन। राजकपूर को लेकर एक किताब। मध्य भारत में फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन का कार्य भी किया । इसके ... Expand 
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लाल सलाम थोड़ा सिंदूरी-सा है

J P Chowksey|Nov 14, 2012, 16:25PM IST

प्रकाश झा की फिल्म ‘चक्रव्यूह’ दो मित्रों की कथा है, जिसमें उनके अपने कर्तव्य की खातिर लिए गए निर्णय जीवन के एक मोड़ पर राजनीतिक सिद्धांतों के कारण उन्हें एक-दूसरे का दुश्मन बना देते हैं। इसके बाद वे उसी शिद्दत से
दुश्मनी निभाते हैं, जिस तरह उन्होंने मित्रता निभाई थी।

इस तरह यह उन लोगों की कहानी है, जो अपनी निष्ठा पर जान की बाजी लगा सकते हैं, परंतु दुर्भाग्यवश वे अनैतिक और स्वार्थी लोगों से घिरे हैं। भारत का गरीब और दलित वर्ग एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा है, जिसकी रचना किसी आचार्य द्रोण ने नहीं की है, वरन इसे स्वार्थी और लोभी लोगों ने रचा है।

हमारा दुख बढ़ जाता है, जब हम इस्पाती इरादों वालों को डरपोक चूहों से हारते हुए देखते हैं और ये दुख अत्यधिक आहत करता है कि इन चूहों को व्यवस्था की रक्षा के लिए चुना था और यही चूहे उस व्यवस्था को कुरेदने लगे हैं।

प्रकाश झा किस तरह के फिल्मकार हैं या भारत के प्रति उनका क्या दृष्टिकोण है, यह उनकी फिल्मों के शीर्षक से ही जाहिर होता है - ‘दामुल’, ‘परिणति’, ‘मृत्युदंड’, ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘आरक्षण’ और ‘चक्रव्यूह’ तथा निर्माणाधीन ‘सत्याग्रह’।

यह बात अलग है कि अब उन्होंने जानकर गहरी समस्याओं पर फिल्में बनाते समय राष्ट्रीय जख्मों का सतही विवरण दिया है, क्योंकि गहराई के लिए शायद दर्शक अभी तैयार नहीं हैं, ऐसा उनका अनुमान और आकलन हो सकता है। बहरहाल, जब अन्य फिल्मकार केवल खोखली फिल्में बना रहे हैं, तब यह बंदा सार्थकता का आग्रह तो रखता है।

सारांश ये कि ‘बंदे में है दम, वंदे मातरम’। इस फिल्म में जनजातियों के शोषण की बात प्रस्तुत की गई है, परंतु यथार्थ जीवन में उनकी स्थिति जानवरों से बदतर है। उन वनों को नष्ट किया जा रहा है, जिनके आर्थिक आधार पर जनजातियां सदियों से मर-मरकर जी रही हैं।

जनजातियों को माओवादियों से दूर करने का एकमात्र उपाय यह है कि उनके हरे-भरे वन उनको लौटा दिए जाएं। प्रकाश झा ने अपनी फिल्म के लिए अनेक यथार्थ घटनाओं, व्यक्तियों और विभिन्न स्थानों का उपयोग करके अपना नया भूगोल भोपाल और पचमढ़ी में गढ़कर उसको एक काल्पनिक प्रदेश का नाम दिया है।

मसलन फिल्म में प्रस्तुत बहुराष्ट्रीय कंपनी ‘मध्यांता’ का आधार संभवत: ओडिशा की ‘वेदांता’ से लिया गया है और बंगाल के नंदीग्राम को नंदीघाट के नाम से स्थापित किया गया है। माओवादी छत्तीसगढ़ और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय हैं, जिनको प्रतीकात्मक तौर पर अपनी कथा में एक ही स्थान पर घटित होते हुए बताया गया है।

कोबाड गांधी नामक धनाढ्य पारसी महान व्यक्ति ने अनेक वर्षो तक क्रांति की है और आज वह जेल में है। इस यथार्थ से प्रेरित पात्र ओम पुरी ने अभिनीत किया है, जो फिल्म में जेल से आजाद होते हुए दिखाया गया है। ज्ञातव्य है कि इसी व्यक्ति की पत्नी जनजातियों की सेवा करते हुए मलेरिया का शिकार हुई है।

इसी तरह फिल्म का पुलिस अफसर नायक जिस यथार्थ व्यक्ति की प्रेरणा से बनाया गया है, वह आज भी सक्रिय है। सारांश यह कि प्रकाश झा ने यथार्थ के छोटे-छोटे टुकड़े चुनकर अपनी फिल्म रखी है, परंतु इस अर्धसत्य में पूर्णसत्य का ताप है और ये उस झूठ से बेहतर है, जो हर शुक्रवार को परोसा जाता है।

इस फिल्म में माओवादी जनजातीय नायिका का पात्र काल्पनिक जरूर है, परंतु नई अभिनेत्री ने अपने सशक्त अभिनय से उसे जीवंत कर दिया है। वह इस तरह प्रशिक्षित कलाकार है कि जब दंभी पुलिसवाले से कहती है कि मेरे बंधे हुए हाथ खोल दे तो बताती हूं कि ४९ पुलिसवाले मैंने कैसे मारे हैं, तो उसकी भावना की तीव्रता को देख यकीन हो जाता है कि उस कोमल-सी कन्या ने तकरीबन ५क् पुलिसवाले मारे होंगे।

इस फिल्म के एक दृश्य में ओमपुरी कबीर नामक पात्र को राजन कहकर पुकारता है तो नायिका ओमपुरी से कहती है कि यह राजन नहीं, कबीर है। तब ओमपुरी कहता है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

यह भी राजन की तरह ही क्रांतिकारी है। ओमपुरी आगे जाकर कबीर को आजाद का नाम देता है और यथार्थ जीवन में भी एक आजाद नाम का माओवादी व्यक्ति हुआ है। प्रकाश झा की इस फिल्म में अनेक मर्मस्पर्शी दृश्य हैं और यह आपको माओवादी संघर्ष की झलक दिखाती है।

आज के दौर में जब हर राजनीतिक दल के लोग भ्रष्टाचार में डूबे हुए दिखाई दे रहे हैं, तब माओवाद का संघर्ष और सिद्धांत अनेक लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। इस फिल्म में अनेक प्रकरण ऐसे हैं, जो माओवादी संग्राम से प्रेरित हैं, परंतु माओवादी लोगों का जीवन जितना कष्टों से भरा होता है, उसका अनुमान आप इस फिल्म से नहीं लगा सकते।

यह फिल्म पूरी तरह लाल सलाम नहीं है, परंतु खून से कुछ मिलता-जुलता-सा रंग है, जिसे सिंदूरी कह सकते हैं। फिल्म उद्योग की स्याह अर्थव्यवस्था में सिंदूरी होना भी कम बात नहीं है। जिस तरह से इस फिल्म का भूगोल काल्पनिक है, उसी तरह से इसमें प्रस्तुत माओवादी इतिहास भी अफसाने की तरह है, परंतु इस सबके बावजूद यह एक सशक्त फिल्म है।

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