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Zahida Hina


ज़ाहिदा हिना पाकिस्तान की जानी-मानी उर्दू की लेखिका हैं। उनके कॉलम, कहानियां, निबंध, उपन्यास और नाटक दुनिया भर में प्रकाशित होते रहते हैं। उन्होनें अपनी पहली कहानी तब लिखी थी जब वे 9 साल की थीं। उन्होनें पत्रकार के रूप में कई ... Expand 
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स्वात की मलाला यूसुफजई

Zahida Hina|Nov 15, 2012, 13:47PM IST
हमारी फूल-सी बच्ची मलाला यूसुफज़ई अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई लड़ रही है और हर देहात में उसके लिए दुआएं हो रही हैं। मस्जिदों और इमामबाड़ों में, चर्च और मंदिरों, स्कूलों और कॉलेजों में। इस पर जिन आतंकवादियों ने गोलियां बरसाईं, उनके ख़िलाफ सारे मुल्क में जुलूस निकल रहे हैं और हर शख्स यही कह रहा है कि मलाला हम तुम्हारे साथ हैं। 
2009 में जब स्वात और दूसरे शुमाली इलाक़ों पर आतंकवादियों का क़ब्जा हो गया तो इन इलाक़ों में रहने वालों को अपने भरे पूरे घर को छोड़कर और अपनी जान बचाकर वहां से जाना पड़ा था। मलाला उस वक़्त 11 बरस की थी और उसे पढ़ने से इश्क़ था, वो घर से ज़्यादा स्कूल को छोड़ते वक़्त ज़ार-ज़ार रोई थी। उसके दिल पर अपनी पढ़ाई छोड़कर जाने का इतना सदमा था कि कुछ दिनों वह गुमसुम रही। फिर उसने ‘गुल मकई’ के नाम से डायरी लिखनी शुरू की, जिसमें वो लिखती थी कि आतंकवाद ने इलाक़े  के सब लोगों की ज़िन्दगी किस तरह जहन्नुम बना दी है। लड़कियों के जब स्कूल बंद कर दिए गए थे, कुछ बमों से उड़ा दिए गए थे और ऐलान कर दिया गया था कि कोई लड़की पढ़ती हुई और स्कूल जाती हुई नज़र न आए। 
 
मलाला को बचपन से ही पढ़ने का और अपना मुक़द्दर बनाने का शौक़ था। वो अपने दिल की भड़ास अपनी डायरी में निकालती रही। उसके वालिद ने उसकी टेढ़ी मेढ़ी लिखाई वाली डायरी बीबीसी के  नुमाइन्दे को दिखाई। उन्होंने इस डायरी का ज़िक्र बीबीसी की उर्दू और पश्तो सर्विस में किया और यूं गुल मकई की डायरी रातोंरात पूरी दुनिया में मशहूर हो गई। 
गुल मकई के नाम से लिखी जाने वाली इस डायरी की शोहरत को पर लग गए। सहाफी यह जानना चाहते थे कि वो मिलिटेंट्स जिनके नाम से अच्छे अच्छों से चेहरे पीले पड़ जाते हैं, उनके ख़िलाफ आवाज़ उठाने वाली ये कौन लड़की है और किस तरह वो यह बातें लिख रही है। कुछ लोगों का यह गुमान भी गुज़ारा  था कि शायद अमन, तालीम और सबके लिए खुशहाली की आरजू में किसी कम उम्र लड़की के नाम से यह कोई और कर रहा है। लेकिन, आहिस्ता-आहिस्ता सब ही जान गए कि गुल मकई दरअसल स्वात की मलाला है। ब्लॉग पर उसकी डायरी के जुमले आए और देखते ही देखते वो एक ऐसे इलाक़े मे अमन और बच्चों की तालीम के हक़ का सिंबल बन गई, जहां हर तरफ दहशतगर्द दनदनाते फिरते थे। वह मुल्क में और मुल्क के बाहर कई अंतरराष्ट्रीय तंजीमों की तरफ से बुलाई गई। इसे कई अलग-अलग सम्मान दिए गए और जब स्वात के हालात बेहतर हुए और स्वातियों की अपने घरों को वापसी शुरू हुई तो मलाला भी अपने घरवालों के  साथ घर को लौट आई और उसने इलाक़े की लड़कियों को हौसला दिया। स्कूल फिर से आबाद हो गए। बच्चियों की चहकार से इलाक़ा गूंज उठा। उन्होंने मलाला को धमकियां दीं, लेकिन जब वह अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटी तो उसे और उसकी साथी लड़कियों को ख़ून में नहला दिया गया।
 
मलाला की स्कूल वैन को रोककर जिस तरह दिन दहाड़े उस पर और उसकी साथी लड़कियों पर गोलियां बरसाईं गईं, इसने सारे पाकिस्तान को हिला कर रख दिया है। हर शख़्स को अंदाज़ हो गया है कि वो दूरदराज़ इलाक़ों में लगी हुई दहशतगर्दी और शिद्दतपसंदी की आग अब हमारे घरों तक आन पहुंची है। मलाला का और उस जैसी लड़कियों का क़ुसूर सिर्फ इतना है कि वो पढ़ना चाहती हैं, डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट बनना चाहती हैं। अपने लोगों को इल्म की रोशनी और अमन की ख़ुशबू देना चाहती हैं। 
 
14 बरस की मलाला इस वक्त मौत और हयात की कशमकश में है। उसके सिर में लगने वाली गोली निकाल ली गई है। लेकिन, हम सब लोगों में ये ख़ंजर उतर गया है कि हमारी ख़ामोशी ने हमारी अगली पीढ़ी को किन ख़तरों के तूफानों की तरफ धकेल दिया है। काश हम इस तूफान से निकल सकें। आप भी हमारे लिए दुआ करें।
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