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Khushwant Singh


खुशवंत सिंह लेखन जगत की जानी मानी शख्सियत हैं। पत्रकार होने के साथ ही वे उपन्यास और कॉलम लिखते हैं। उनकी नॉवेल 'ट्रेन टू पाकिस्तान' खासी लोकप्रिय है। सरकार द्वारा उन्हें पद्म विभूषण सम्मान से भी नवाज़ा गया है।
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रोशनी के नगीने की उपासना

Khushwant Singh|Nov 15, 2012, 14:30PM IST
सूर्योदय का नजारा काफी हसीन होता है, जिसे देखकर हमें काफी सुकून मिलता है। सूरज को उगते हुए देखना वास्तव में बहुत शानदार अनुभव होता है। यह प्रभात की वह बेला होती है, जब आकाश में लालिमा छा जाती है और भोर का तारा अपनी पूरी आभा के साथ दमक रहा होता है। हम रोज उगते हुए सूरज का दीदार करते हैं, फिर भी हमारा इससे मन नहीं भरता। हमारे यहां उगते हुए सूरज की आराधना करने की भी परंपरा है।

ऐसा करते हुए हम संभवत: अपने खुशहाल जीवन में एक नई सुहानी सुबह देने के लिए उस ईश्वरीय शक्ति के प्रति आभार प्रकट करते हैं। दुनिया की तमाम भाषाओं के साहित्य में उगते हुए सूरज के बारे में कुछ न कुछ लिखा गया है। इस संदर्भ में मुझे उमर खैयाम की एक फारसी रुबाई याद आ रही है, जिसमें सूर्याेदय की बेला का बहुत खूबसूरत जिक्र है। यह रुबाई कुछ इस तरह है :-

उठो-जागो,
रोशनी के उस बेमिसाल नगीने के दीदार के लिए,
जिसने भोर के तारे को दी है, 
एक नई परवाज।
और देखो, पूरब से आए इस बहेलिए ने
फांस लिया है सुल्तान के कंगूरों को
अपनी जगमग किरणों के फंदे में।
जब सुहानी भोर की बायीं भुजा,
ठहरी हुई थी आसमान में।
तभी मैंने मयखाने में सुना, 
किसी का क्रंदन।
उठो-जागो, मेरे दुलारो
और भर लो अपना प्याला।
इससे पहले कि सूख जाए
जीवन की मदिरा 
उसके प्याले से।

गायत्री महामंत्र को भी कुछ लोग सूर्य की उपासना से जोड़ते हैं। यह यजुर्वेद के मंत्र ‘ú भूभरुव: स्व:’ और ऋग्वेद के छंद ३.६२.१क् के मेल से बना है। सूर्योदय व सूर्यास्त के समय इसका पाठ किया जाता है। 

ओम भूभरुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं।
भर्गो देवस्य धीमहि धियो योन: प्रचोदयात।

इसका भावार्थ है- ‘उस प्राणस्वरूप, दु:खनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें और वह हमें सन्मार्ग की ओर ले जाए।’
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