Mark Manuel
दैनिकभास्कर के कंसल्टिंग एडिटर मार्क मैनुअल कई वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता जगत में उनकी पहचान ऐसे लोगों में होती है जिन्होनें कई प्रसिद्ध लोगों के इंटरव्यू लिए हैं जिनमें मदर टेरेसा से लेकर मुहम्मद अली
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अपनी जिंदगी खुलकर जीती हूं, बुढ़ापे से क्या डरना
Mark Manuel|Nov 15, 2012, 17:31PM IST
वैसे, यह ओहदा जुड़ने के अलावा उनमें कुछ नहीं बदला है। मुझे कुछ ही समय पहले एक इंटरव्यू के जरिए उनकी खूबसूरत और जिंदादिली से भरपूर जिंदगी में झांकने का मौका मिला। आज जब रेखा सांसद बनी हैं तो उनकी जिंदगी से जुड़ी कई बातें जानना आपके लिए भी काफी दिलचस्प होगा।
उस इंटरव्यू में रेखा ने अपनी शोहरत, किस्मत, जिंदगी, जुनून, पेशा...तमाम मुद्दों पर खुल कर बात की और बताया कि रेखा होने के क्या मायने हैं। मुंबई में एक शाम चाय पर मुलाकात में इस खूबसूरत अभिनेत्री ने जो बातें हमारे साथ साझा की थीं, उनके कुछ अंश मैं आपके साथ साझा कर रहा हूं।
बांद्रा में ताज लैंडस एंड का हेल्थ क्लब। हर्बल टी होने के बावजूद रेखा ने चाय की दूसरी प्याली पकड़ी हुई थी। जाहिर है, वह चाय का पूरा मजा ले रहीं थीं। रेखा यहां हर शाम आती हैं। रविवार को भी। रेखा ने अपनी मदहोश कर देने वाली आवाज में बताया था। बिना मेकअप के, बैगी ट्रैक सूट पहनीं रेखा गजब ढा रही थीं। उम्र के असर से सौ फीसदी बेअसर। शायद यह उनकी नियमित वर्जिश का नतीजा हो।
उन्होंने बड़े आराम से अपने फिटनेस रुटीन के बारे में बताया और कहा कि उनका वजन ज्यादा नहीं है लेकिन वह फ्री हैंड एक्सरसाइज ज्यादा करती हैं। योग और कार्डियो के बीच में डांस, स्ट्रेच भी। कोई नियम बना कर एक्सरसाइज नहीं करतीं। और यह उनकी जिंदगी पर भी लागू होता है।
बकौल रेखा, 'अपने होने के प्रत्येक क्षण का आनंद लेना चाहिये। हर दिन ही नहीं, बल्कि सेकण्ड दर सेकण्ड। इससे हम यह सीखते हैं कि जिंदगी को किस तरह देखना चाहिये । मैं खुद पर ज्यादा बोझ नहीं डालती। साधारण वेज खाना खातीं हूं, पैर जमीन पर रखती हूं। मां ने जो सिखाया वे मूल्य मेरे अंदर आज भी हैं। मैंने अपना खजाना पा लिया है और यह हर एक को करना चाहिये। जब तक यह महसूस होता है तब तक जिंदगी दरक चुकी होती है। इसलिए मेरे लिए प्रत्येक दिन एक पुनर्जन्म की तरह है।'
यहां पर मेरे पास उनके लिए एक सवाल था। मैं जानना चाहता था कि वह सरवाइव कैसे करती हैं? केवल बॉलीवुड में ही नहीं (क्योंकि वह यहां एक्टिव नहीं हैं)। दुनिया की दिलचस्पी उनमें बनी रहे, यह प्रयास वह कैसे करतीं हैं? मेरे पास तमाम सवाल थे मसलन उनका एकाकीपन, सिल्वर स्क्रीन की शोहरत चले जाने के बाद के हालात, अपने बुढ़ापे से डर, बीमारी और ऐसी अन्य चीजें।
एक बार उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि ईश्वर ने उन्हें चुना। मैं यह जानना चाहता था कि ईश्वर के चुने लोगों को भी आखिरकार बिल तो चुकाने ही होते हैं। ऐसे में उनका गुजारा कैसे चलता है?
‘सरवाइव’? रेखा ने भौंहे तानते हुए यह प्रश्न मुझको जैसे वापस कर दिया था। 'मैं सरवाइवर नहीं हूं,बल्कि जिंदगी को पूरी तरह जीती हूं। मुझे किसी नेटवर्क या लोगों से मिलने की जरूरत नहीं है। मैं सेलफोन इस्तेमाल नहीं करती। मैं किसी लग्जरी से बंधे रहना नहीं चाहती। यह बड़ा अजीबोगरीब है कि खुद के बारे में ही बात की जाए। मेरे लिए लग्जरी का आशय मेरी प्राथमिकताएं हैं और मेरी प्राथमिकता है जिससे मैं मिलना चाहूं, उससे ही मिलूं। जहां मैं चाहूं, जब मैं चाहूं। जहां तक बिल चुकाने का प्रश्न है एक आदमी को जिंदगी में कितना पैसा चाहिए?
जितना अधिक चाहेंगे उतनी अधिक जरूरतें बढ़ जायेंगी। मैं कम से ही बहुत खुश हूं। मैं बहुत कम फिल्में करतीं हूं कई बार तो मुझे यह याद दिलाना पड़ता है कि मैं एक अभिनेत्री हूं। एक ऐसा समय भी था जब मेरे बैंक में कुछ भी नहीं था लेकिन बुरे दिनों के लिए अब कुछ बचा कर रख लिया है। मां के कुछ आभूषण हैं और कपड़े। मैं मिक्स-मैच करके पहन लेती हूं। करीब बीस साल पहले मेरे पास डिजायनर कपड़ों का भंडार था लेकिन यह अब सब बहुत महंगा है। मैं अब पार्टियों में नहीं जाती तो इन कपड़ों का मैं क्या करूंगी। मैं अब केवल एयरपोर्ट से घर तक के रास्ते के लिए ही कपड़ों का चुनाव करतीं हूं। यह मेरा सबसे लंबा कैटवाक है! '
राज बाहर आ रहे थे और वह बहुत चाव से और दिल से बातें कर रहीं थीं। उन्होंने माना कि उन्हें फिल्मों, विज्ञापन, रियलिटी शो और अपना टीवी शो करने के ऑफर मिले। यहां तक कि पैसों के लिए पार्टियों में नाचने के लिए भी। जो शायद बॉलीवुड में चल भी रहा है। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि क्या कहना है और कब कहना है और वह टेलीविजन पर अपनी बात कहना चाहेंगी लेकिन पता नहीं कब।
रेखा ने अपनी चिरपरिचित मुस्कराहट के साथ कहा कि ईश्वर ने उन्हें स्त्री का शरीर दिया। महिला के पास पुरूष से ज्यादा अनुभवों का खजाना होता है। अच्छा, बुरा और शायद इससे भी ज्यादा। कहीं ज्यादा गहरा और तीखा। क्योंकि एक स्त्री होने के नाते हम ये बातें दिल से लेते हैं। मैंने अकेले रहना चुना। सब कुछ मेरे पर था लेकिन अब मैं अपनी पसंद नापसंदगी से दूर निकल आयीं हूं। टीवी पर जो दिखता है वह सत्य नहीं है। जीवन वह है जिसकी आप योजना बनाते हैं और जो वास्तविकता में घटित होता है। जो पटकथा में है वह हकीकत नहीं है ।
बुढ़ापा ,बीमारी मुझे इस सबसे डर नहीं लगता। इनसे क्यों डरा जाए। जो हमारे हाथ में नहीं है उसे लेकर एक मिनट भी डरना फिजूल है। ठीक वैसे ही जब हम भ्रूण अवस्था में होते हैं कुछ पता नहीं होता कि जिंदगी किधर मुड़ेगी। इसलिए आप देखें कि मैं जिंदगी जी रही हूं न कि सर्वाइव कर रही हूं। क्या समझे?
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