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लाखों युवाओं के रोल मॉडल के पतन से हम ले सकते हैं 5 सबक

Kalpesh Yagnik|Nov 15, 2012, 18:22PM IST

इस अदालत ने पहले कभी ऐसे मुल्किाम को नहीं देखा जो मानवता के लिए असाधारण रूप से ऐसे समर्पित हो। बहुत अच्छे इंसान हैं रजत गुह्रश्वता। किन्तु इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जब अच्छे लोग, बुरा काम करते पाए गए हों।Ó

                                                 - न्यूयॉर्क के जज जेड रकॉफ् ; इनसाइडर ट्रेडिंग के फैसले में


आखिर क्यों? लाखों अमेरिकी बिजऩेस लीडर्स-प्रोफेशनल्स में पोस्टर बॉयÓ बने हुए रजत गुह्रश्वता का ऐसा पतन क्यों हो गया? उन्हें जेल क्यों हुई? प्रश्न तो लाखों भारतीय युवाओं के मन में यही है कि उनके पतन के कारण के कारणÓ क्या रहे होंगे? इससे भी बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम सब पतन की इस हैरतअंगेज कहानी से कुछ सबक ले सकते हैं?

चूंकि स्वयं रजत लगातार एरर ऑफ जजमेंटÓ यानी समझने में चूक हो जाने की ही बात अपनी सफाई में देते रहे हैं- इसलिए सभी ने उन्हें भूलवशÓ सूचनाएं देने की मासूम $गलती करने वाला ही मान रखा है। ऐसा मानने के मूल में सबसे बड़ी बात उन्हें सूचना लीक करने के लिए पैसा तक नहीं मिला।Ó मित्रवशÓ बताते रहे होंगे राजारत्नम को। यह भी भरोसा है उनके अनगिनत प्रशंसकों का। झूठा भरोसा है यह।

क्योंÓ खोजना ही चाहिए। ढेरों कारण होंगे- किन्तु कुछ उभर कर सामने आ रहे हैं। यही वे कारण हैं, जिनसे हम भी बहुत कुछ सीख सकते हैं:

१. $गलत मित्र का चयन

२. अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान न रखना

३. बातचीत के गांभीर्य को न समझ पाना

४. वर्षों की तपस्या के बाद यकायक लाभ-शुभÓ की महत्वाकांक्षा जगना

५. कुछ भी करने से पहले अपने परिवार, पूर्वजों, प्रियजन के बारे में न सोचना

 

१. $गलत मित्र का चयन : श्रीलंकाई कारोबारी राज राजारत्नम् को मित्र बनाना रजत की सबसे बड़ी भूल थी। जिस एरर ऑफ जजमेंटÓ की वे बात कर रहे हैं- वो सूचनाएं लीक करना नहीं थी। गैलिअन ग्रुप बनाकर इस तमिल अमेरिकी हेज फंड संस्थापक ने हर सूचना पर करोड़ों कमाए। भले तो हैं, किन्तु रजत इतने भोले नहीं हैं कि कुछ समझ ही न पाएं। मित्र किसे बनाना- यह रजत से बढक़र कौन समझ सकता है- क्योंकि संयुक्त राष्ट्र के महासचिव रहे कोफी अन्नान, परोपकार के लिए प्रसिद्ध माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन व हिलेरी उनके पारिवारिक मित्र रहे हैं। किन्तु, जब कारोबारी मित्रता के लिए चुनना था- तो उन्होंने $गलत मित्र चुन लिया। जो सिर्फ पैसे कमाना चाहता था। रजत के स्वभाव के विपरीत।

 

२. अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान न रखना : यह पढऩे में अजीब लग सकता है। किन्तु तथ्य हैं। और तर्क भी। कोई संयोग नहीं था कि २९ जुलाई २००८ को गोल्डमैन, मंदी के दौर में एआईजी खरीद सकता है जैसी बोर्ड की बैठक की गोपनीय जानकारी पर आगे क्याÓ की चर्चा कर बैठे। गोल्डमैन में डायरेक्टर रहते हुए उन्हें किसे -कितना क्या बताना है, बखूबी पता था ही। गोल्डमैन बोर्ड में वे अपनी ४० बरस की कठोर अनुशासित पारी के कारण बैठे थे। प्रॉक्टर एंड गैम्बल बोर्ड में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। दोनों की निगाहों में, लाखों इन्वेस्टर्स के मन पर क्या बीतेगी- ऐसा रजत नहीं सोच पाए। उन्होंने दरअसल, इसे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ा ही नहीं कभी!

 

३. बातचीत के गांभीर्य को न समझ पाना : आईआईटी टॉपर, हॉर्वर्ड की स्कॉलरशिप में टॉपर, हॉर्वर्ड में भी टॉपर। मैकेंजी में इतनी लगन, इतने परिणाम कि परम्परा तोडऩी पड़ी। पहले गैर-अमेरिकी जो मैनेजिंग डायरेक्टर बने। और ऐसे शख्स के बारे में यह लिखना कि वे अपनी

बातचीत के गांभीर्य को न समझ पाएÓ बहुत खराब, गलत या कि हास्यास्पद कारण लग सकता है। किन्तु सच यही है। अन्यथा २३ सितंबर २००८ को गोल्डमैन बोर्ड में आई अति-गोपनीय, अति संवेदनशील जानकारी वे राजारत्नम् को न पहुंचाते। इनवेस्टमेंट किंग वॉरेन बुफे 5 बिलियन डॉलर गोल्डमैन में लगा रहे हैं। यह थी सूचना। गांभीर्य समझते तो (भले ही लीक करते) कभी भी बोर्ड बैठक के ठीक १६ सेकेंड बाद ही राजारत्नम् को नहीं पहुंचाते। न ही अपने असिस्टेंट को माध्यम बनाते! जी, हां, इतनी विस्फोटक जानकारी उन्होंने अपने असिस्टेंट को दी। फिर उन्हीं के फोन से राजारत्नम् को पहुंचाई! एक और बात। तय हुआ था कि बुफे के इतने बड़े इन्वेस्टमेंट की घोषणा शाम 4 बजे बाद की जाएगी- ठीक शेयर बाजार बंद होने के बाद। ताकि अगली सुबह भारी उछाल आए। मारकाट मचे। राजारत्नम् कुछ ज्यादा ही चालाक बन गए। ३.५५ बजे गोल्डमैन के 4 करोड़ शेयर खरीद डाले। 5 मिनिट में १० लाख डॉलर कमाए! इस टाइमिंगÓ का गांभीर्य समझे क्या रजत? वैसी ही ग़लती दोहराई २३ अक्टूबर २००८ को। बोर्ड कॉन्फ्रेंस हॉल में बुरी खबर दी गई कि गोल्डमैन के पब्लिक हो जाने के बाद पहली बार घाटा घोषित होगा। कोई २३ सेकेंड बाद रजत ने राजारत्नम को स्वयं फोन किया। लीक किया। अदालत में सरकार ने बताया एक सूचना पर राजारत्नम् ने लाखों डॉलर बचा लिए। जो वे लगाने जा रहे थे।

 

४. वर्षों की तपस्या के बाद अचानक लाभ-शुभÓ की महत्वाकांक्षा जगना : चाहे कोलकाता में पत्रकार पिता अश्विन गुह्रश्वता के संस्कार और सीख पर चलना हो या कि अमेरिका में अफ्रीका के $गरीब बच्चों के लिए लाखों डॉलर जुटाना- रजत की तपस्या का तेज़ सभी मानते हैं। किंतु उनके पतन के मूल में एक विचित्र और दु:खद कारण भी हो सकता है। हो सकता है अचानक उन्हें ६३ की उम्र में अहसास हुआ हो कि वे करोड़ों-अरबों के कारोबारी साम्राज्य पर काबिज तो रहे। शीर्ष पर भी बने रहे। किंतु इस अकूत धन-संपत्ति के वे कस्टोडियन, रखवाले ही

तो रहे! मालिक कहां बने? जबकि उन्हीं की शिक्षा, दक्षता, रणनीति से ये कारोबार चल रहे हैं। वे ऐसा सोच सकते हैं। हैव आय मिस्ड द बसयानी क्या मैं अवसर चूक गया? यूं अमेरिका में चार-पांच फ्लैट, बंगले, फार्म आदि अचल संपत्ति है उनकी। चारों बेटियां खुश हैं। संपन्न हैं। पत्नी स्वयं आईआईटी दिल्ली में उनकी दो वर्ष जूनियर थीं। किंतु कारोबार के बाहर अपनी निजी संपत्ति और अपनी निजी कंपनी क्योंकर नहीं खोली जा सकती? उतने पैसों के लिए कोई राजारत्नम् की तरह का पथभ्रष्ट अरबपति ही काम का लगा होगा उन्हें। स्वयं जज रकॉफ् ने भी एक टिह्रश्वपणी की है : रजत गुप्ता को इतने चैरिटी के काम के बाद, हो सकता है कारोबार की नई, बड़ी दुनिया में कुछ न कर गुजरने की कुंठा रही हो। इसीलिए राजारत्नम् जैसे चालाक का साथ पकड़ा हो। जो ऐसे नए कारोबार को फंड कर सके। रजत जिसका नेतृत्व कर सकें।Ó

 

५. कुछ भी करने से पहले अपने परिवार, पुरखों व प्रियजन के बारे में न सोचना : जज को चिट्ठी लिखने वाले अनुयायी, प्रियजन दुनिया में नहीं मिल सकते। आईएसबी (इंडियन स्कूल ऑफ बिजऩेस), हैदराबाद जैसे संस्थान के पहले डीन प्रमथ राज सिन्हा ने न्यूयॉर्क में डटकर जज को दिए जाने वाले पत्र लिखे, लिखवाए और वीडियो बनाए, भेजे। आईएसबी, रजत ने ही स्थापित किया था। कुछ भी करने से पहले खुद से पूछते यदि रजत, अपने परिवार का सोचते तो वे ऐसा कुछ न करते। क्योंकि अपने साढ़े सात सौ शब्दों के कोर्ट को सौंपे पत्र में रजत ने परिवार व प्रियजन- व वे संस्थान जो उन्हें प्रिय हैं- का ही जिक्र किया। वे भावुक हुए तो परिवार -प्रियजन के लिए ही।

 

लोकसभा में एक मशहूर नेहरू-लोहिया बहस है। इसमें दोनों नेताओं ने यह कहा था कि कोई एक बात, एक बुराई- बाकी सौ अच्छाइयों पर हावी हो जाती है। जिंदगीभर वह पीछा नहीं छोड़ती। रजत गुप्ता प्रकरण ठीक वैसा ही है।

 

जीवन के नाजुक दौर में, निर्णय के उन अवसरों पर; हम कुछ नहीं सोच पाते। यह सब अब सोचा जा रहा है। सब कुछ नष्ट होने के बाद। वह भी दूर बैठकर। वह भी अपनी तरह से। पहले सोच पाना असंभव सा ही है। किन्तु सोचना ही होगा। क्योंकि हमारी एक भूल, एक पहल, एक बात न जाने कितनी जिंदगियां बिगाड़ सकती है। कितनी उम्मीदें नष्ट कर सकती है। रजत को जो हुआ सो हुआ, हम सीख ले सकते हैं। हम अपनी-अपनी तरह की इनसाइडर ट्रेडिंग में लगे हैं। जिनके कानून नहीं होते। असंभव लगता है। है नहीं।

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