Home >> Blogs >> Bloggers >> M J Akbar >> विनाशकारी शुरुआत के अंत का एक मौका
M J Akbar


मोबाशर जावेद अकबर जाने माने पत्रकार और लेखक हैं। वे साप्ताहिक अखबार 'द संडे गार्जियन' के एडिटर-इन-चीफ हैं। वे अंग्रेज़ी साप्ताहिक मैगज़ीन 'इंडिया टुडे' के एडिटोरियल डायरेक्टर भी रह चुके हैं। साथ ही अकबर 'द एशियन एज' अखबार के ... Expand 
5 Blogs | 10 Followers
M J Akbar के अन्य ब्लॉग

विनाशकारी शुरुआत के अंत का एक मौका

M J Akbar|Nov 16, 2012, 14:11PM IST
राजनीति एक मुश्किल दुनिया है। यहां ठंडे दिमाग के निर्णयों की दरकार होती है। श्रीमती सोनिया गांधी, डॉ. मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति भवन के लिए प्रोन्नत कर और फिर एक बिल्कुल अलग तरह की सरकार का गठन कर अपनी पार्टी की बड़ी भलाई कर सकती हैं। उनके पास प्रणब मुखर्जी के रूप में एक स्वाभाविक उत्तराधिकारी भी है। श्रीमती गांधी जानती हैं कि सरकार बदलने का वक्त आ चुका है, क्योंकि यदि वे नहीं बदलती हैं, तो जनता बदल देगी..

संतों की तादाद तो इतनी अधिक है कि एक मोटा रजिस्टर भर जाए, पर कुछ ही हैं जो जनस्मृति पर एक असर छोड़ पाते हैं। सन् 354 से 430 के बीच जीवित रहे संत ऑगस्टिन ऐसे ही शख्स हैं, जिन्होंने इस कदर अमिट छाप छोड़ी है कि उद्धरणों का कोई भी संकलन उनके बगैर पूरा नहीं होता। स्वीकारोक्तियों की तीसरी किताब में भावी पीढ़ी के लिए दर्ज एक प्रार्थना किसी भी अमर सूक्ति का बोझ वहन करती है। यह लगभग हमेशा और करीब-करीब पूरी तरह से गलत उद्धृत की जाती है, हालांकि कभी इसका रूप नहीं बिगड़ता। ऑगस्टिन ईश्वर से प्रार्थना करते हैं : ‘मुझे पवित्रता और आत्मसंयम प्रदान करो- लेकिन अभी नहीं।’ 

यह उक्ति दिल्ली की किसी भी सरकार के लिए सूत्रवाक्य का कार्य कर सकती है। हर मंत्री पवित्र और ईमानदार होना चाहता है, परंतु मंत्रालय से अपनी रवानगी के बाद ही। सत्ता में रहते हुए मंत्री अपने कैबिनों के बाहर एक टैक्सी मीटर लगाते हैं, जो उनकी निजी जेबों में जाने वाले भुगतानों के चालू खाते में दर्ज करता चलता है। यूपीए2, यूपीए1 का अंधकारमय और दरुगधयुक्त अभिशाप बन चुका है। घोटाले तेजी से जन्म ले रहे हैं। आरंभिक सौदा तो बड़ी फुर्ती से हो जाता है। दोनों पक्षों को अपनी-अपनी नीयत बताने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। दलाल बेहद माहिर हैं। यदि कहीं कोई समय जाता भी है, तो सिर्फ मोलभाव में। 

आखिरकार, कुल धनराशि बहुत बड़ी होती है। लेकिन चूंकि दोनों पक्ष जानते हैं कि वे किसी भी मामले में सौदा करने ही वाले हैं, इसलिए एक मुनासिब समय-सीमा के भीतर सौदेबाजी हो ही जाती है। समय तो लगता है घोटाले को उधेड़ने में। कारोबारी परियोजना को कागज से जमीन तक पहुंचना होता है और फिर वितरण की शुरुआत होती है। कोई ऐसा हो, जो शिकायत करे। शिकायत को गंभीरता से लेने के लिए संबद्ध पुलिस या भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी को भरोसा दिलाए। 

फिर कैग सरीखे निकायों को बड़ी सतर्कता और बारीकी से तैयार की गई रिपोर्ट को सिरे से जोड़ने में बरसों लग जाते हैं। ऐसी रिपोर्ट, जो बेनकाब होने जा रहे लोगों के छिद्रान्वेषण में टिक सके। रिश्वत देने और लेने वाले अपनी पतली चमड़ी बचाने के लिए कानूनी सहायता तथा पीआर मैनेजमेंट पर खूब खर्च करते हैं। और यहां तक कि पर्दाफाश हो जाने के बाद भी संभव है कि खुलासों में तत्काल आग न पकड़े। कोयला खनन में भारी-भरकम घोटाले की जानकारी पहले से रही है। लूट में मंत्री के रिश्तेदारों की सहभागिता और उनके पूर्ववर्ती के भ्रष्टाचार में रहस्य जैसी कोई बात शायद ही हो। लेकिन चिंगारी तब भड़की, जब टीम अन्ना प्रमं मनमोहन सिंह को सीधे निशाने की जद में ले आई।

सत्ता प्रतिष्ठान ने इस पंक्ति के इर्द-गिर्द खूब आस्तीनें चढ़ाई हैं कि प्रधानमंत्री की निजी ईमानदारी असंदिग्ध है। शायद ऐसा ही हो, हालांकि यह विशेषता निश्चितता से फिसलकर ‘संभवत:’ पर पहुंच चुकी है। लेकिन प्रमं. एक तथ्य से बच नहीं सकते। शिबू सोरेन के इस्तीफे के बाद से वे कोयला मामलों के वरिष्ठ प्रभारी मंत्री रहे हैं। यदि यह भारी-भरकम लूट उनकी निगरानी में हुई है, तो फिर उन्हें जवाबदेह होना ही होगा। यदि उन्होंने राष्ट्रीय संसाधनों को ऐसे ही जाने दिया है, तो फिर उन्हें जवाब देना होगा, भले ही यह लूटमार दूसरों ने की हो। उनके पास एक ही प्रतिक्रिया हो सकती है और भले ही यह ईमानदार प्रतिक्रिया हो कि उन्होंने फाइलों को पढ़ा नहीं था, यह नाकाफी और असंगत है। 

यह विडंबना है कि एक ऐसे प्रधानमंत्री को, जिसने अक्सर सार्वजनिक तौर पर दावा किया है कि उसका जीवन एक खुली किताब है, ऐसी सरकार का संचालन करना चाहिए, जो बंद किताबों की अंतहीन श्रंखला के अलावा और कुछ नहीं। 1947 से किसी भी सरकार में भ्रष्टाचार का ऐसा सतत रिकॉर्ड नहीं रहा था। नाड़ियों में घुले पाप में अब शासन व्यवस्था का ढहना भी जुड़ गया है। 2009 में डॉ. सिंह के पास प्रचार के लायक काम का लेखा-जोखा था। 2012 तक यह लेखा-जोखा इतना विकृत हो चुका है कि कांग्रेस, जनता तक जाकर उससे वोट नहीं मांग सकती। हालांकि लोग देंगे भी नहीं। 

श्रीमती सोनिया गांधी इस बात को जानती हैं। यहां तक कि कोर समूह की बैठकों में भी उनकी बॉडी लैंग्वेज से यह संपूर्ण हताशा झलकती है। वे जानती हैं कि सरकार बदलने का वक्त आ चुका है, क्योंकि यदि वे नहीं बदलती हैं, तो जनता बदल देगी। और जब जनता ऐसा करती है, तो चिथड़ी भी नहीं बचती। राजनीतिक कैलेंडर एक अवसर उपलब्ध कराता है। राष्ट्रपति का निर्वाचन होना है। अपने उम्मीदवार के बारे में कांग्रेस के मौन ने सभी तरह के छुपे हुए घोड़ों के बारे में अटकलबाजियों को जन्म दिया है, जिनमें कुछ अप्रत्याशित हैं, तो अन्य दागदार। यहां तक कि साफ लंगड़े नजर आने वाले कुछ घोड़े भी हैं, पर वे लगातार जिद पर अड़े हैं कि वे भी दौड़ में हैं। श्रीमती सोनिया गांधी, डॉ. सिंह को राष्ट्रपति भवन के लिए प्रोन्नत कर और फिर एक बिल्कुल अलग तरह की सरकार का गठन कर अपनी पार्टी की बड़ी भलाई कर सकती हैं। 

उनके पास प्रणब मुखर्जी के रूप में एक स्वाभाविक उत्तराधिकारी भी है। भले ही गपशप करने वाले समूह इस बात पर अड़े हों कि दोनों के बीच खटके की खाई है, पर यह पक्का है कि अब तक वे भावुकता को किनारे रखने के लिए साथ-साथ पर्याप्त कवायद कर चुके हैं। राजनीति एक मुश्किल दुनिया है। यहां ठंडे दिमाग के निर्णयों की दरकार होती है। श्रीमती गांधी के पास विकल्प नहीं हैं, क्योंकि डॉ. सिंह की जगह लेने वाले शख्स को गठबंधन सहयोगियों द्वारा स्वीकार्य होना होगा और ज्यादा महत्वपूर्ण, देश की जनता द्वारा। हो सकता है कि वे अपने पुत्र राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहती हों, लेकिन यह विचार निकट भविष्य में नहीं चलने वाला। राहुल गांधी यूपी में यह राह पा सकते थे। पर उन्हें नहीं मिली।

मुखर्जी की दिशा में यह बदलाव जून मध्य में हो सकता है। अब एक और यादगार उद्धरण को दोहराने का वक्त है, जो है दूसरे विश्वयुद्ध के लीडर विंस्टन चर्चिल का। यह अंत की शुरुआत का संकेत भले ही न हो, पर यह यूपीए2 की विनाशकारी शुरुआत का अंत हो सकता है।
आपके विचार

 
कोड :
9 + 1

(4)
Latest | Popular
 

Other Bloggers

विज्ञापन

Popular Blogs

Featured Bloggers

Popular Categories

| Email Print Comment